भगवान गणेश का प्राकट्य दिवस; मूर्ति-स्थापना से अनंत चतुर्दशी तक गणेशोत्सव।
समय:
दिन का मध्य भाग (लगभग 11 से 1:30 के बीच, स्थान अनुसार)
पूजन सामग्री: आवश्यक वस्तुओं की सूची
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चरणबद्ध विधि
🔥 अग्नि सुरक्षा: दीपक, कपूर, धूप या हवन की अग्नि जलाते समय सावधानी रखें। बच्चे केवल वयस्कों की देखरेख में भाग लें। जलती अग्नि को कभी अकेला न छोड़ें, पास में पानी रखें और पर्दे, कपड़े व कागज़ दूर रखें। हवन खुले या हवादार स्थान पर करें।
पूजा मुहूर्त · शनिवार, 4 सितंबर 2027
मध्याह्न पूजा मुहूर्त: 11:04 AM – 1:36 PM
नई दिल्ली के अनुसार। दूसरे शहरों में समय कुछ मिनट अलग हो सकता है — स्थानीय पंचांग या पुरोहित से पुष्टि करें।
हर श्लोक के बाद 2 सेकंड का विराम · बीच में रोकें, आगे या पीछे जाएँ
1. पवित्रीकरण
ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा।
यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः॥
व्यक्ति पवित्र हो या अपवित्र, किसी भी अवस्था में हो — जो कमलनयन भगवान का स्मरण करता है, वह भीतर और बाहर से शुद्ध हो जाता है। कमलनयन प्रभु हमें पवित्र करें।
बाएं हाथ में जल लेकर दाएं हाथ की अंगुलियों से अपने ऊपर, आसन पर तथा पूजा-सामग्री पर जल छिड़कें।
सामग्री: जल पात्र (लोटा) व आचमनी, गंगाजल
2. आचमन
ॐ केशवाय नमः। ॐ नारायणाय नमः। ॐ माधवाय नमः॥
ॐ हृषीकेशाय नमः। हस्तं प्रक्षालयामि॥
भगवान केशव, नारायण और माधव को नमस्कार करते हुए आंतरिक शुद्धि हेतु जल ग्रहण करता/करती हूँ; हृषीकेश के नाम से हाथ धोता/धोती हूँ।
दाहिने हाथ की हथेली (गोकर्ण मुद्रा) में थोड़ा जल लेकर एक-एक नाम के साथ तीन बार जल ग्रहण करें, फिर 'हृषीकेशाय नमः' बोलकर हाथ धो लें।
AI अभ्यास स्वर — वैदिक स्वर शामिल नहीं; उच्चारण की पुष्टि अपने पुरोहित से करें
यशस्वी इन्द्र, सर्वज्ञ पूषा, अरिष्टनेमि गरुड़ और बृहस्पति — ये सब हमारा कल्याण करें। तीनों प्रकार की शांति हो।
हाथ जोड़कर मंगल-पाठ करें।
6. संकल्प
ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः। श्रीमद्भगवतो महापुरुषस्य विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्य अद्य श्रीब्रह्मणो द्वितीयपरार्धे श्रीश्वेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरे अष्टाविंशतितमे कलियुगे कलिप्रथमचरणे जम्बूद्वीपे भरतखण्डे भारतवर्षे आर्यावर्तैकदेशे (नगर/गांव का नाम) नगरे (संवत्सर का नाम (60 वर्ष चक्र)) नामसंवत्सरे (अयन) (ऋतु (संधि सहित)) (हिंदू मास) मासे (पक्ष) पक्षे (तिथि) तिथौ (वार) वासरे (गोत्र) गोत्रोत्पन्नः/उत्पन्ना (पूजा करने वाले का नाम) नामाहं श्रीसिद्धिविनायकप्रीत्यर्थं गणेशचतुर्थीपूजनं करिष्ये॥
कोष्ठक ( ) वाले शब्द — पंचांग व गोत्र — संकल्प में आप स्वयं बोलें; ▶ संकल्प सुनें में पंडित जी इन्हें पूछेंगे। नाम व नगर प्रोफ़ाइल से भरे जाते हैं।
मैं (नाम, गोत्र) इस काल, इस स्थान पर, इस उद्देश्य से यह पूजा करने का संकल्प लेता/लेती हूँ।
दाहिने हाथ में जल, अक्षत, पुष्प और दक्षिणा लेकर संकल्प-वाक्य पढ़ें (ऐप आपके नगर, तिथि, नाम व गोत्र से स्वतः भरता है), अंत में जल भूमि या ताम्रपात्र में छोड़ दें।
सामग्री: जल पात्र (लोटा) व आचमनी, अक्षत (साबुत चावल), ताजे पुष्प, दक्षिणा (सिक्का/मुद्रा)
गज के समान मुख वाले, भूतगणों से सेवित, कैथ व जामुन के फल प्रेम से खाने वाले, उमा के पुत्र, शोक का नाश करने वाले विघ्नेश्वर के चरण-कमलों को मैं नमस्कार करता/करती हूँ।
हाथ जोड़कर नेत्र बंद करें और देवता के स्वरूप का मन में ध्यान करते हुए ध्यान-श्लोक पढ़ें।
अग्नि का स्वर्ण-बीज, हिरण्यगर्भ से उत्पन्न, अनंत पुण्य देने वाली यह दक्षिणा अर्पित है — मुझे शांति दें।
सिक्का/मुद्रा देवता के सामने दक्षिणा रूप में रखें।
सामग्री: दक्षिणा (सिक्का/मुद्रा)
38. मंत्र जप
ॐ गं गणपतये नमः
गं बीज सहित गणों के स्वामी गणपति को नमस्कार।
जप-माला से देवता के मूल मंत्र का जप करें — संक्षिप्त मोड 11, मध्यम 21, पूर्ण 108 बार।
सामग्री: जप माला (108 मनके)
39. कथा / पाठ
कथा-श्रवण या स्तोत्र-पाठ से पूजा का फल पूर्ण होता है।
कथा पढ़ें/सुनें: गणेश जन्म कथा व स्यमन्तक मणि कथा — कथा-सार शीट 19 में।
सामग्री: पूजनीय ग्रंथ/पुस्तक
गणेश जन्म कथा व स्यमन्तक मणि कथा
माता पार्वती ने उबटन से एक बालक रचकर उसे द्वारपाल बनाया; भगवान शिव को रोकने पर शिव ने उसका सिर काट दिया। पार्वती के दुःख को देखकर शिव ने गज का सिर लगाकर बालक को जीवित किया और उसे गणों का अधिपति व प्रथम-पूज्य होने का वर दिया।
स्यमन्तक मणि: भगवान कृष्ण पर मणि-चोरी का मिथ्या कलंक लगा (प्रसेन को सिंह ने, सिंह को जाम्बवान ने मारा था)। कृष्ण ने जाम्बवान से मणि लाकर सत्राजित को लौटाई और कलंक से मुक्त हुए। चतुर्थी पर चन्द्र-दर्शन से लगे मिथ्या कलंक के निवारण हेतु यह कथा सुनी जाती है।
40. आरती (नीराजन)
कदलीगर्भसम्भूतं कर्पूरं तु प्रदीपितम्।
आरार्तिक्यमहं कुर्वे पश्य मे वरदो भव॥
ॐ श्रीसिद्धिविनायकाय नमः। आरार्तिक्यं समर्पयामि॥
कदली-गर्भ से उत्पन्न, प्रज्वलित कपूर से मैं आरती करता/करती हूँ — मेरी ओर देखें और वर देने वाले हों।
कपूर या घी की आरती थाली को देवता के चरणों पर 4 बार, नाभि पर 2 बार, मुख पर 1 बार और समस्त अंगों पर 7 बार घुमाएं; घंटी बजाते हुए आरती गाएं।
सबके हित के लिए स्थित, जगत के आधार आपको नमस्कार — यह साष्टांग प्रणाम मैंने प्रयत्नपूर्वक किया है।
साष्टांग (या हाथ जोड़कर सिर झुकाकर) प्रणाम करें।
44. क्षमा प्रार्थना
आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम्।
पूजां चैव न जानामि क्षमस्व परमेश्वर॥
मन्त्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं सुरेश्वर।
यत्पूजितं मया देव परिपूर्णं तदस्तु मे॥
अनेन पूजनेन श्रीसिद्धिविनायकः प्रीयताम्, न मम॥
मैं आवाहन, विसर्जन और पूजा की विधि नहीं जानता/जानती — क्षमा करें। मंत्र, क्रिया और भक्ति में जो कमी रही, उसके बावजूद मेरी पूजा परिपूर्ण हो। इस पूजा से देवता प्रसन्न हों; इसका फल मेरा नहीं, उन्हीं का है।
हाथ जोड़कर पूजा में हुई भूलों हेतु क्षमा मांगें; अंत में जल छोड़ते हुए पूजा का फल देवता को अर्पित करें।
सामग्री: जल पात्र (लोटा) व आचमनी
45. प्रसाद व चरणामृत
प्रसाद आदरपूर्वक स्वयं ग्रहण करें और परिवारजनों में बांटें।
चरणामृत/प्रसाद स्वयं ग्रहण करें और परिवारजनों में वितरित करें।
सामग्री: नैवेद्य (मिठाई/भोग)
46. चन्द्र दर्शन निषेध
सिंहः प्रसेनमवधीत्सिंहो जाम्बवता हतः।
सुकुमारक मा रोदीस्तव ह्येष स्यमन्तकः॥
सिंह ने प्रसेन को मारा और सिंह को जाम्बवान ने मारा; हे सुकुमार, मत रो — यह स्यमन्तक मणि तेरी ही है। (मिथ्या कलंक निवारण मंत्र)
गणेश चतुर्थी की रात्रि (वर्जित अवधि में) चन्द्रमा न देखें। भूलवश दिख जाए तो स्यमन्तक मणि कथा सुनें/पढ़ें और यह मंत्र पढ़ें।
सभी देवगण मेरी पूजा स्वीकार कर अपने धाम जाएं — मेरी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए और पुनः आगमन के लिए।
अक्षत छोड़ते हुए आवाहित देवताओं को आदरपूर्वक विदा करें। (स्थापित मूर्ति का विसर्जन नहीं होता — केवल आवाहित शक्ति का।)
सामग्री: अक्षत (साबुत चावल)
48. उत्तर पूजा व गणेश विसर्जन
ॐ श्रीसिद्धिविनायकाय नमः। उत्तरपूजां समर्पयामि॥
विदाई से पूर्व अंतिम पूजा अर्पित करता/करती हूँ।
डेढ़, तीन, पांच, सात या दस दिन (अनंत चतुर्दशी) पर पंचोपचार उत्तर-पूजा व आरती करें; 'गणपति बप्पा मोरया' के साथ शुद्ध जल में विसर्जन करें (इको-फ्रेंडली: घर पर बाल्टी में विसर्जन कर जल पौधों में डालें)।
यह पाठ कार्यपुस्तिका संस्करण से है; परिवार व क्षेत्र की परंपरा के अनुसार विधि भिन्न हो सकती है।
॥ श्री गणेश जी की आरती ॥
जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती पिता महादेवा॥
एक दंत दयावंत चार भुजा धारी।
माथे सिंदूर सोहे मूसे की सवारी॥ जय गणेश...
पान चढ़े फूल चढ़े और चढ़े मेवा।
लड्डुअन का भोग लगे संत करें सेवा॥ जय गणेश...
अंधन को आंख देत कोढ़िन को काया।
बांझन को पुत्र देत निर्धन को माया॥ जय गणेश...
'सूर' श्याम शरण आए सफल कीजे सेवा।
माता जाकी पार्वती पिता महादेवा॥ जय गणेश...
दीनन की लाज रखो शंभु सुतकारी।
कामना को पूर्ण करो जाऊं बलिहारी॥
जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती पिता महादेवा॥