भक्त प्रह्लाद की रक्षा और होलिका दहन — बुराई पर अच्छाई की विजय; अगले दिन रंगोत्सव।
समय:
फाल्गुन पूर्णिमा, प्रदोष काल, भद्रा रहित समय
क्या न करें:
भद्रा काल में होलिका दहन न करें।
पूजन सामग्री: आवश्यक वस्तुओं की सूची
0 / 17 वस्तुएँ तैयार
चरणबद्ध विधि
🔥 अग्नि सुरक्षा: दीपक, कपूर, धूप या हवन की अग्नि जलाते समय सावधानी रखें। बच्चे केवल वयस्कों की देखरेख में भाग लें। जलती अग्नि को कभी अकेला न छोड़ें, पास में पानी रखें और पर्दे, कपड़े व कागज़ दूर रखें। हवन खुले या हवादार स्थान पर करें।
पूजा मुहूर्त · रविवार, 21 मार्च 2027
होलिका दहन मुहूर्त: 6:33 PM – 8:55 PM
भद्रा समाप्त: 5:17 AM
नई दिल्ली के अनुसार। दूसरे शहरों में समय कुछ मिनट अलग हो सकता है — स्थानीय पंचांग या पुरोहित से पुष्टि करें।
हर श्लोक के बाद 2 सेकंड का विराम · बीच में रोकें, आगे या पीछे जाएँ
1. पवित्रीकरण
ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा।
यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः॥
व्यक्ति पवित्र हो या अपवित्र, किसी भी अवस्था में हो — जो कमलनयन भगवान का स्मरण करता है, वह भीतर और बाहर से शुद्ध हो जाता है। कमलनयन प्रभु हमें पवित्र करें।
बाएं हाथ में जल लेकर दाएं हाथ की अंगुलियों से अपने ऊपर, आसन पर तथा पूजा-सामग्री पर जल छिड़कें।
सामग्री: जल पात्र (लोटा) व आचमनी, गंगाजल
2. आचमन
ॐ केशवाय नमः। ॐ नारायणाय नमः। ॐ माधवाय नमः॥
ॐ हृषीकेशाय नमः। हस्तं प्रक्षालयामि॥
भगवान केशव, नारायण और माधव को नमस्कार करते हुए आंतरिक शुद्धि हेतु जल ग्रहण करता/करती हूँ; हृषीकेश के नाम से हाथ धोता/धोती हूँ।
दाहिने हाथ की हथेली (गोकर्ण मुद्रा) में थोड़ा जल लेकर एक-एक नाम के साथ तीन बार जल ग्रहण करें, फिर 'हृषीकेशाय नमः' बोलकर हाथ धो लें।
सामग्री: जल पात्र (लोटा) व आचमनी
3. संकल्प
ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः। श्रीमद्भगवतो महापुरुषस्य विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्य अद्य श्रीब्रह्मणो द्वितीयपरार्धे श्रीश्वेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरे अष्टाविंशतितमे कलियुगे कलिप्रथमचरणे जम्बूद्वीपे भरतखण्डे भारतवर्षे आर्यावर्तैकदेशे (नगर/गांव का नाम) नगरे (संवत्सर का नाम (60 वर्ष चक्र)) नामसंवत्सरे (अयन) (ऋतु (संधि सहित)) (हिंदू मास) मासे (पक्ष) पक्षे (तिथि) तिथौ (वार) वासरे (गोत्र) गोत्रोत्पन्नः/उत्पन्ना (पूजा करने वाले का नाम) नामाहं सकलारिष्टशान्त्यर्थं होलिकापूजनं करिष्ये॥
कोष्ठक ( ) वाले शब्द — पंचांग व गोत्र — संकल्प में आप स्वयं बोलें; ▶ संकल्प सुनें में पंडित जी इन्हें पूछेंगे। नाम व नगर प्रोफ़ाइल से भरे जाते हैं।
मैं (नाम, गोत्र) इस काल, इस स्थान पर, इस उद्देश्य से यह पूजा करने का संकल्प लेता/लेती हूँ।
दाहिने हाथ में जल, अक्षत, पुष्प और दक्षिणा लेकर संकल्प-वाक्य पढ़ें (ऐप आपके नगर, तिथि, नाम व गोत्र से स्वतः भरता है), अंत में जल भूमि या ताम्रपात्र में छोड़ दें।
सामग्री: जल पात्र (लोटा) व आचमनी, अक्षत (साबुत चावल), ताजे पुष्प, दक्षिणा (सिक्का/मुद्रा)
4. गणेश स्मरण
वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ।
निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥
ॐ गं गणपतये नमः। गन्धाक्षतपुष्पाणि समर्पयामि॥
हे वक्र सूंड वाले, विशाल शरीर वाले, करोड़ों सूर्यों के समान तेजस्वी देव! मेरे सभी कार्य सदा निर्विघ्न करें।
किसी भी पूजा से पहले विघ्नहर्ता गणेश जी का ध्यान करें और अक्षत-पुष्प अर्पित करें। (गणेश पूजा में यह चरण मुख्य पूजा में समाहित है।)
हे होली! राक्षसी के भय से त्रस्त लोगों ने तुम्हें रचा है; इसलिए मैं तुम्हारी पूजा करता/करती हूँ — हे भूति! ऐश्वर्य देने वाली बनो।
होलिका (लकड़ी-उपलों के ढेर) पर जल, रोली, अक्षत, फूल, गुलाल, हल्दी, गुड़, साबुत मूंग, बताशे और नारियल चढ़ाएं; भक्त प्रह्लाद और भगवान नृसिंह का स्मरण करें।
सामग्री: जल पात्र (लोटा) व आचमनी, रोली/कुमकुम, अक्षत (साबुत चावल), ताजे पुष्प, गुलाल/अबीर, हल्दी, साबुत मूंग, खील-बताशे, जटा वाला नारियल
6. कच्चा सूत परिक्रमा
परिक्रमा और सूत्र-बंधन से परिवार की रक्षा की कामना।
कच्चे सूत को होलिका के चारों ओर 3 या 7 बार लपेटते हुए परिक्रमा करें; फिर लोटे से जल अर्पित करें।
घी और बत्ती से युक्त, अग्नि से प्रज्वलित, तीनों लोकों का अंधकार दूर करने वाला दीप स्वीकार करें।
घी का दीपक देवता को दिखाएं, फिर हाथ धो लें।
सामग्री: घी का दीपक व रुई की बत्ती
9. दहन व नई फसल
नई फसल का पहला अंश अग्नि को अर्पित कर प्रसाद रूप में ग्रहण करना।
शुभ मुहूर्त में होलिका दहन के बाद गेहूं/जौ की बालियां अग्नि में भूनकर प्रसाद रूप में ग्रहण करें और दहन की परिक्रमा करें।
सामग्री: गेहूं/जौ की बालियां
10. क्षमा प्रार्थना
आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम्।
पूजां चैव न जानामि क्षमस्व परमेश्वर॥
मन्त्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं सुरेश्वर।
यत्पूजितं मया देव परिपूर्णं तदस्तु मे॥
अनेन पूजनेन श्रीनृसिंहः प्रीयताम्, न मम॥
मैं आवाहन, विसर्जन और पूजा की विधि नहीं जानता/जानती — क्षमा करें। मंत्र, क्रिया और भक्ति में जो कमी रही, उसके बावजूद मेरी पूजा परिपूर्ण हो। इस पूजा से देवता प्रसन्न हों; इसका फल मेरा नहीं, उन्हीं का है।
हाथ जोड़कर पूजा में हुई भूलों हेतु क्षमा मांगें; अंत में जल छोड़ते हुए पूजा का फल देवता को अर्पित करें।
सामग्री: जल पात्र (लोटा) व आचमनी
11. धूलि वंदन (अगले दिन)
होलिका भस्म का तिलक रोग-दोष निवारक माना जाता है।
अगली सुबह होलिका की ठंडी भस्म का तिलक लगाएं; फिर रंग-गुलाल के साथ धुलेंडी मनाएं।
सामग्री: गुलाल/अबीर
यह पाठ कार्यपुस्तिका संस्करण से है; परिवार व क्षेत्र की परंपरा के अनुसार विधि भिन्न हो सकती है।
॥ श्री विष्णु जी की आरती ॥
ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे।
भक्त जनों के संकट, क्षण में दूर करे॥ ॐ जय जगदीश हरे॥
जो ध्यावे फल पावे, दुःख बिनसे मन का।
स्वामी दुःख बिनसे मन का, सुख सम्पत्ति घर आवे, कष्ट मिटे तन का॥ ॐ जय जगदीश हरे॥
मात-पिता तुम मेरे, शरण गहूं मैं किसकी।
स्वामी शरण गहूं मैं किसकी, तुम बिनु और न दूजा, आस करूं जिसकी॥ ॐ जय जगदीश हरे॥
तुम पूरन परमात्मा, तुम अंतर्यामी।
स्वामी तुम अंतर्यामी, पारब्रह्म परमेश्वर, तुम सबके स्वामी॥ ॐ जय जगदीश हरे॥
तुम करुणा के सागर, तुम पालनकर्ता।
स्वामी तुम पालनकर्ता, मैं सेवक तुम स्वामी, कृपा करो भर्ता॥ ॐ जय जगदीश हरे॥
तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति।
स्वामी सबके प्राणपति, किस विधि मिलूं दयामय, तुमको मैं कुमति॥ ॐ जय जगदीश हरे॥
दीनबंधु दुखहर्ता, तुम ठाकुर मेरे।
स्वामी तुम ठाकुर मेरे, अपने हाथ उठाओ, द्वार पड़ा तेरे॥ ॐ जय जगदीश हरे॥
विषय विकार मिटाओ, पाप हरो देवा।
स्वामी पाप हरो देवा, श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ, सन्तन की सेवा॥ ॐ जय जगदीश हरे॥
श्री जगदीश हरे प्रभु जय जगदीश हरे।
भक्त जनों के संकट क्षण में दूर करे॥ ॐ जय जगदीश हरे॥