1. सरगी व व्रत आरंभ
सरगी से दिनभर के निर्जला व्रत का आरंभ होता है।
सूर्योदय से पहले सास द्वारा दी गई सरगी (फल, मेवा, मिठाई) ग्रहण करें और निर्जला व्रत का आरंभ करें।
सामग्री: ऋतुफल, मिठाई
0 / 32 वस्तुएँ तैयार
पूजा मुहूर्त: 5:38 PM – 6:56 PM
चन्द्रोदय: 8:17 PM
नई दिल्ली के अनुसार। दूसरे शहरों में समय कुछ मिनट अलग हो सकता है — स्थानीय पंचांग या पुरोहित से पुष्टि करें।हर श्लोक के बाद 2 सेकंड का विराम · बीच में रोकें, आगे या पीछे जाएँ
सरगी से दिनभर के निर्जला व्रत का आरंभ होता है।
सूर्योदय से पहले सास द्वारा दी गई सरगी (फल, मेवा, मिठाई) ग्रहण करें और निर्जला व्रत का आरंभ करें।
सामग्री: ऋतुफल, मिठाई
ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा। यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः॥
ॐ पुण्डरीकाक्षः पुनातु। ॐ पुण्डरीकाक्षः पुनातु। ॐ पुण्डरीकाक्षः पुनातु॥
व्यक्ति पवित्र हो या अपवित्र, किसी भी अवस्था में हो — जो कमलनयन भगवान का स्मरण करता है, वह भीतर और बाहर से शुद्ध हो जाता है। कमलनयन प्रभु हमें पवित्र करें।
बाएं हाथ में जल लेकर दाएं हाथ की अंगुलियों से अपने ऊपर, आसन पर तथा पूजा-सामग्री पर जल छिड़कें।
सामग्री: जल पात्र (लोटा) व आचमनी, गंगाजल
ॐ केशवाय नमः। ॐ नारायणाय नमः। ॐ माधवाय नमः॥
ॐ हृषीकेशाय नमः। हस्तं प्रक्षालयामि॥
भगवान केशव, नारायण और माधव को नमस्कार करते हुए आंतरिक शुद्धि हेतु जल ग्रहण करता/करती हूँ; हृषीकेश के नाम से हाथ धोता/धोती हूँ।
दाहिने हाथ की हथेली (गोकर्ण मुद्रा) में थोड़ा जल लेकर एक-एक नाम के साथ तीन बार जल ग्रहण करें, फिर 'हृषीकेशाय नमः' बोलकर हाथ धो लें।
सामग्री: जल पात्र (लोटा) व आचमनी
ॐ पृथ्वि त्वया धृता लोका देवि त्वं विष्णुना धृता। त्वं च धारय मां देवि पवित्रं कुरु चासनम्॥
ॐ आसनदेवतायै नमः॥
हे पृथ्वी देवी! आपने सभी लोकों को धारण किया है और भगवान विष्णु ने आपको धारण किया है। आप मुझे भी धारण करें और मेरे आसन को पवित्र करें।
आसन के नीचे भूमि पर थोड़ा जल छिड़कें और आसन को स्पर्श करते हुए मंत्र पढ़ें।
सामग्री: आसन (कुश/ऊनी), जल पात्र (लोटा) व आचमनी
शुभं करोति कल्याणमारोग्यं धनसम्पदा। शत्रुबुद्धिविनाशाय दीपज्योतिर्नमोऽस्तु ते॥
ॐ दीपज्योतिषे नमः॥
जो शुभ करती है, कल्याण, आरोग्य और धन-सम्पदा देती है तथा शत्रु-बुद्धि का नाश करती है — उस दीप-ज्योति को नमस्कार।
घी का दीपक जलाकर देवता के दाहिनी ओर (आपकी बाईं ओर) रखें; तेल का दीपक हो तो देवता के बाईं ओर। दीपक को प्रणाम करें।
सामग्री: घी का दीपक व रुई की बत्ती, माचिस
ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः। श्रीमद्भगवतो महापुरुषस्य विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्य अद्य श्रीब्रह्मणो द्वितीयपरार्धे श्रीश्वेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरे अष्टाविंशतितमे कलियुगे कलिप्रथमचरणे जम्बूद्वीपे भरतखण्डे भारतवर्षे आर्यावर्तैकदेशे (नगर/गांव का नाम) नगरे (संवत्सर का नाम (60 वर्ष चक्र)) नामसंवत्सरे (अयन) (ऋतु (संधि सहित)) (हिंदू मास) मासे (पक्ष) पक्षे (तिथि) तिथौ (वार) वासरे (गोत्र) गोत्रोत्पन्नः/उत्पन्ना (पूजा करने वाले का नाम) नामाहं मम सुखसौभाग्यपुत्रपौत्रादिसुस्थिरश्रीप्राप्तये करकचतुर्थीव्रतमहं करिष्ये॥
कोष्ठक ( ) वाले शब्द — पंचांग व गोत्र — संकल्प में आप स्वयं बोलें; ▶ संकल्प सुनें में पंडित जी इन्हें पूछेंगे। नाम व नगर प्रोफ़ाइल से भरे जाते हैं।
मैं (नाम, गोत्र) इस काल, इस स्थान पर, इस उद्देश्य से यह पूजा करने का संकल्प लेता/लेती हूँ।
दाहिने हाथ में जल, अक्षत, पुष्प और दक्षिणा लेकर संकल्प-वाक्य पढ़ें (ऐप आपके नगर, तिथि, नाम व गोत्र से स्वतः भरता है), अंत में जल भूमि या ताम्रपात्र में छोड़ दें।
सामग्री: जल पात्र (लोटा) व आचमनी, अक्षत (साबुत चावल), ताजे पुष्प, दक्षिणा (सिक्का/मुद्रा)
वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ। निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥
ॐ गं गणपतये नमः। गन्धाक्षतपुष्पाणि समर्पयामि॥
हे वक्र सूंड वाले, विशाल शरीर वाले, करोड़ों सूर्यों के समान तेजस्वी देव! मेरे सभी कार्य सदा निर्विघ्न करें।
किसी भी पूजा से पहले विघ्नहर्ता गणेश जी का ध्यान करें और अक्षत-पुष्प अर्पित करें। (गणेश पूजा में यह चरण मुख्य पूजा में समाहित है।)
सामग्री: अक्षत (साबुत चावल), ताजे पुष्प, रोली/कुमकुम
कलशस्य मुखे विष्णुः कण्ठे रुद्रः समाश्रितः। मूले तत्र स्थितो ब्रह्मा मध्ये मातृगणाः स्मृताः॥
ॐ वरुणाय नमः। कलशं पूजयामि॥
कलश के मुख में विष्णु, कंठ में रुद्र, मूल में ब्रह्मा और मध्य में मातृगण निवास करते हैं — ऐसे सर्वदेवमय कलश का पूजन करता/करती हूँ।
जल भरे कलश (आम्रपल्लव व नारियल सहित) पर रोली, अक्षत व पुष्प अर्पित करें। पूर्ण कलश-स्थापना हेतु शीट 11 देखें।
सामग्री: कलश (तांबा/पीतल/मिट्टी), आम के 5 पत्ते, जटा वाला नारियल, मौली/कलावा, गंगाजल
सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके। शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते॥
ॐ शिवायै नमः। ध्यायामि॥
हे सब मंगलों की मंगलरूपा, कल्याणकारिणी, सब पुरुषार्थ सिद्ध करने वाली, शरणागतवत्सला, त्रिनेत्रा गौरी नारायणी! आपको नमस्कार।
हाथ जोड़कर नेत्र बंद करें और देवता के स्वरूप का मन में ध्यान करते हुए ध्यान-श्लोक पढ़ें।
ॐ शिवायै नमः (पार्वती)। ॐ नमः शिवाय (शिव)। ॐ गणेशाय नमः (गणेश)। ॐ षण्मुखाय नमः (कार्तिकेय)॥
माता पार्वती, भगवान शिव, गणेश और कार्तिकेय को नमस्कार।
दीवार/पट पर करवा चौथ चित्र या मिट्टी की गौरी (गौर) बनाकर शिव, गणेश और कार्तिकेय सहित स्थापित करें; सभी को रोली-अक्षत-पुष्प अर्पित करें।
सामग्री: देव प्रतिमा/चित्र, रोली/कुमकुम, अक्षत (साबुत चावल), ताजे पुष्प
आगच्छ वरदे देवि दैत्यदर्पनिषूदिनि। पूजां गृहाण सुमुखि नमस्ते शङ्करप्रिये॥
ॐ शिवायै नमः। आवाहयामि स्थापयामि॥
हे वर देने वाली, दैत्यों का दर्प नष्ट करने वाली देवी! पधारिए। हे सुमुखी, शंकरप्रिये — मेरी पूजा स्वीकार करें, आपको नमस्कार।
आवाहन मुद्रा (दोनों हथेलियां जोड़कर अंगूठे भीतर मोड़ें) से देवता को पूजा-स्थल पर पधारने का निमंत्रण दें; अक्षत छोड़ें।
सामग्री: अक्षत (साबुत चावल)
रम्यं सुशोभनं दिव्यं सर्वसौख्यकरं शुभम्। आसनं च मया दत्तं गृहाण परमेश्वरि॥
ॐ शिवायै नमः। आसनार्थे पुष्पाणि समर्पयामि॥
सुंदर, दिव्य, सब सुख देने वाला यह शुभ आसन मैंने अर्पित किया है — हे प्रभु, इसे स्वीकार करें।
दोनों हाथों की अंजलि में पांच पुष्प या अक्षत लेकर देवता के आसन हेतु अर्पित करें।
सामग्री: ताजे पुष्प
गङ्गोदकं निर्मलं च सर्वसौगन्धसंयुतम्। पादप्रक्षालनार्थाय दत्तं ते प्रतिगृह्यताम्॥
ॐ शिवायै नमः। पादयोः पाद्यं समर्पयामि॥
सब सुगंधों से युक्त यह निर्मल गंगाजल चरण धोने के लिए दिया है — इसे स्वीकार करें।
आचमनी से थोड़ा जल देवता के चरणों में (या चरणों की ओर रखे पात्र में) अर्पित करें।
सामग्री: जल पात्र (लोटा) व आचमनी
अर्घ्यं गृहाण देवेशि गन्धपुष्पाक्षतैः सह। करुणां कुरु मे देवि गृहाणार्घ्यं नमोऽस्तु ते॥
ॐ शिवायै नमः। हस्तयोः अर्घ्यं समर्पयामि॥
हे देवेश! गंध, पुष्प और अक्षत सहित यह अर्घ्य स्वीकार करें और मुझ पर करुणा करें; आपको नमस्कार।
जल में गंध, अक्षत व पुष्प मिलाकर देवता के हाथों की ओर अर्घ्य दें।
सामग्री: जल पात्र (लोटा) व आचमनी, चंदन, अक्षत (साबुत चावल), ताजे पुष्प
कर्पूरवासितं तोयं मन्दाकिन्याः समाहृतम्। आचम्यतां जगन्मातः मया दत्तं हि भक्तितः॥
ॐ शिवायै नमः। आचमनीयं जलं समर्पयामि॥
गंगा से लाया, कपूर से सुवासित यह जल मैंने भक्तिपूर्वक दिया है — हे जगत के स्वामी, आचमन करें।
आचमनी से थोड़ा शुद्ध जल देवता को आचमन हेतु अर्पित करें।
सामग्री: जल पात्र (लोटा) व आचमनी
मन्दाकिन्यास्तु यद्वारि सर्वपापहरं शुभम्। तदिदं कल्पितं देवि स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम्॥
ॐ शिवायै नमः। स्नानं समर्पयामि॥
मन्दाकिनी (गंगा) का जो शुभ, सब पापों को हरने वाला जल है, वह आपके स्नान हेतु प्रस्तुत है — स्वीकार करें।
शुद्ध जल से प्रतिमा को स्नान कराएं। चित्र हो तो पुष्प से जल के छींटे दें।
सामग्री: जल पात्र (लोटा) व आचमनी, गंगाजल
शीतवातोष्णसंत्राणं लज्जाया रक्षणं परम्। देहालङ्करणं वस्त्रमतः शान्तिं प्रयच्छ मे॥
ॐ शिवायै नमः। वस्त्रं समर्पयामि॥
सर्दी, हवा और गर्मी से बचाने वाला, लज्जा की रक्षा करने वाला और देह को सुशोभित करने वाला वस्त्र अर्पित है — मुझे शांति दें।
देवता को वस्त्र अर्पित करें (देवी को लाल चुनरी)। वस्त्र न हो तो मौली/कलावा वस्त्र-स्थान पर चढ़ाएं।
सामग्री: वस्त्र या मौली (वस्त्र स्थान पर)
सिन्दूरं शोभनं रक्तं सौभाग्यं सुखवर्धनम्। शुभदं कामदं चैव सिन्दूरं प्रतिगृह्यताम्॥
ॐ शिवायै नमः। सौभाग्यद्रव्याणि समर्पयामि॥
सुंदर, लाल, सौभाग्य और सुख बढ़ाने वाला, शुभ व मनोकामना देने वाला सिंदूर स्वीकार करें।
देवी को सिंदूर, कुमकुम, हल्दी व सौभाग्य-सामग्री अर्पित करें (देवी पूजा में यज्ञोपवीत के स्थान पर)।
सामग्री: सिंदूर, रोली/कुमकुम, हल्दी
श्रीखण्डं चन्दनं दिव्यं गन्धाढ्यं सुमनोहरम्। विलेपनं सुरश्रेष्ठे चन्दनं प्रतिगृह्यताम्॥
ॐ शिवायै नमः। गन्धं समर्पयामि॥
सुगंध से भरा, मनोहर, दिव्य श्रीखंड चंदन लेपन हेतु है — हे देवश्रेष्ठ, स्वीकार करें।
अनामिका अंगुली से देवता को चंदन/रोली का तिलक लगाएं।
सामग्री: चंदन, रोली/कुमकुम
अक्षताश्च सुरश्रेष्ठे कुङ्कुमाक्ताः सुशोभिताः। मया निवेदिता भक्त्या गृहाण परमेश्वरि॥
ॐ शिवायै नमः। अक्षतान् समर्पयामि॥
कुमकुम से सुशोभित ये अक्षत मैंने भक्ति से निवेदित किए हैं — स्वीकार करें।
कुमकुम मिले अक्षत (साबुत चावल) अर्पित करें।
सामग्री: अक्षत (साबुत चावल), रोली/कुमकुम
माल्यादीनि सुगन्धीनि मालत्यादीनि वै प्रभो। मयानीतानि पुष्पाणि गृहाण परमेश्वरि॥
ॐ शिवायै नमः। पुष्पाणि पुष्पमालां च समर्पयामि॥
मालती आदि सुगंधित पुष्प और मालाएं मैं लाया/लाई हूँ — हे प्रभु, इन्हें स्वीकार करें।
देवता को ताजे पुष्प और पुष्पमाला अर्पित करें (देवता के प्रिय पुष्प हेतु शीट 13 देखें)।
सामग्री: ताजे पुष्प, पुष्पमाला
ॐ शिवायै नमः। रक्तवस्त्रं श्रृङ्गारद्रव्याणि च समर्पयामि॥
लाल वस्त्र और श्रृंगार-सामग्री अर्पित करता/करती हूँ।
लाल चुनरी और श्रृंगार-सामग्री (सिंदूर, बिंदी, चूड़ी, मेहंदी) अर्पित करें।
सामग्री: लाल चुनरी, सोलह श्रृंगार सामग्री
वनस्पतिरसोद्भूतो गन्धाढ्यो गन्ध उत्तमः। आघ्रेयः सर्वदेवानां धूपोऽयं प्रतिगृह्यताम्॥
ॐ शिवायै नमः। धूपम् आघ्रापयामि॥
वनस्पतियों के रस से बनी, उत्तम सुगंध वाली, सभी देवताओं के सूंघने योग्य यह धूप स्वीकार करें।
धूप/अगरबत्ती जलाकर बाएं हाथ से घंटी बजाते हुए दाहिने हाथ से देवता को धूप दिखाएं।
सामग्री: धूप/अगरबत्ती, घंटी, माचिस
साज्यं च वर्तिसंयुक्तं वह्निना योजितं मया। दीपं गृहाण देवेशि त्रैलोक्यतिमिरापहम्॥
ॐ शिवायै नमः। दीपं दर्शयामि। हस्तप्रक्षालनम्॥
घी और बत्ती से युक्त, अग्नि से प्रज्वलित, तीनों लोकों का अंधकार दूर करने वाला दीप स्वीकार करें।
घी का दीपक देवता को दिखाएं, फिर हाथ धो लें।
सामग्री: घी का दीपक व रुई की बत्ती
शर्कराखण्डखाद्यानि दधिक्षीरघृतानि च। आहारं भक्ष्यभोज्यं च नैवेद्यं प्रतिगृह्यताम्॥ ॐ प्राणाय स्वाहा। ॐ अपानाय स्वाहा। ॐ व्यानाय स्वाहा। ॐ उदानाय स्वाहा। ॐ समानाय स्वाहा॥
ॐ शिवायै नमः। नैवेद्यं निवेदयामि॥
शक्कर, मिठाइयां, दही, दूध, घी तथा भक्ष्य-भोज्य आहार रूपी यह नैवेद्य स्वीकार करें। पांचों प्राणों को यह आहुति समर्पित है।
भोग की थाली देवता के सामने रखें, उसके चारों ओर जल से घेरा बनाएं (विष्णु-कृष्ण-राम को तुलसी दल रखकर), फिर पंच-प्राणाहुति मंत्र बोलें।
सामग्री: नैवेद्य (मिठाई/भोग), जल पात्र (लोटा) व आचमनी
हिरण्यगर्भगर्भस्थं हेमबीजं विभावसोः। अनन्तपुण्यफलदमतः शान्तिं प्रयच्छ मे॥
ॐ शिवायै नमः। दक्षिणां समर्पयामि॥
अग्नि का स्वर्ण-बीज, हिरण्यगर्भ से उत्पन्न, अनंत पुण्य देने वाली यह दक्षिणा अर्पित है — मुझे शांति दें।
सिक्का/मुद्रा देवता के सामने दक्षिणा रूप में रखें।
सामग्री: दक्षिणा (सिक्का/मुद्रा)
ॐ गौर्यै नमः
माता गौरी को नमस्कार।
जप-माला से देवता के मूल मंत्र का जप करें — संक्षिप्त मोड 11, मध्यम 21, पूर्ण 108 बार।
सामग्री: जप माला (108 मनके)
कथा-श्रवण या स्तोत्र-पाठ से पूजा का फल पूर्ण होता है।
कथा पढ़ें/सुनें: करवा चौथ की प्रचलित व्रत कथाएं (वीरवती, करवा माता, द्रौपदी, गणेश जी) — कथा-सार शीट 19 में। (इस व्रत में कथा अनिवार्य है)
सामग्री: पूजनीय ग्रंथ/पुस्तक
1. वीरवती की कथा
एक साहूकार के सात बेटे और वीरवती नाम की एक बेटी थी। सातों भाई अपनी इकलौती बहन से बहुत स्नेह करते थे। विवाह के बाद पहली करवा चौथ पर वीरवती मायके में थी। उसने भाभियों के साथ निर्जल व्रत रखा, पर शाम होते-होते वह भूख-प्यास से व्याकुल होकर मूर्छित-सी हो गई।
भाइयों से बहन की यह दशा देखी न गई। उन्होंने दूर एक पेड़ की ओट में दीपक जलाया और छलनी के पीछे से उसे चांद जैसा दिखा दिया। भाभियों ने समझाया कि यह असली चांद नहीं है, पर वीरवती ने उसे चांद समझकर अर्घ्य दिया और भोजन करने बैठ गई।
पहले कौर में बाल निकला, दूसरे कौर पर छींक आई और तीसरा कौर उठाते ही ससुराल से पति की मृत्यु का समाचार आ गया। वीरवती रोती-बिलखती ससुराल पहुंची।
वहां इंद्राणी (कई परंपराओं में माता पार्वती) ने उसे बताया कि झूठा चांद देखकर व्रत तोड़ने से यह अनर्थ हुआ है। उन्होंने कहा कि यदि वह पूरे वर्ष हर मास की चतुर्थी का व्रत श्रद्धा से करे और अगली करवा चौथ का व्रत विधिपूर्वक करे, तो उसका सुहाग लौट आएगा।
वीरवती पूरे वर्ष पति के शव के पास बैठी रही और श्रद्धा से हर चतुर्थी का व्रत करती रही। अगली करवा चौथ पर उसने निर्जल व्रत रखा, सोलह श्रृंगार किया और असली चंद्रमा के दर्शन करके अर्घ्य दिया। व्रत के पुण्य और देवी की कृपा से उसका पति फिर से जीवित हो उठा। इसीलिए करवा चौथ का व्रत चंद्रमा के दर्शन और अर्घ्य के बाद ही खोला जाता है।
2. करवा माता की कथा
प्राचीन काल में करवा नाम की एक पतिव्रता स्त्री अपने पति के साथ नदी किनारे एक गांव में रहती थी। एक दिन नदी में स्नान करते समय एक मगरमच्छ ने उसके पति का पैर पकड़ लिया और उसे गहरे पानी में खींचने लगा।
पति की पुकार सुनकर करवा दौड़ी आई और अपने पतिव्रत के बल से कच्चे सूत के धागे से मगरमच्छ को ऐसा बांध दिया कि वह हिल भी न सका। फिर उसने यमराज का स्मरण किया।
यमराज प्रकट हुए तो करवा ने प्रार्थना की कि वे मगरमच्छ को दंड दें और उसके पति की रक्षा करें। यमराज ने चित्रगुप्त के लेखे का उल्लेख करते हुए कहा कि मगरमच्छ की आयु अभी शेष है। तब करवा ने कहा कि यदि उन्होंने उसके पति की रक्षा न की, तो वह उन्हें शाप दे देगी।
करवा के पतिव्रत के तेज और शाप के भय से यमराज ने मगरमच्छ को यमलोक भेज दिया और उसके पति को दीर्घायु का वरदान दिया। तभी से सुहागिनें करवा माता का स्मरण कर यह व्रत करती हैं और प्रार्थना करती हैं: हे करवा माता, जैसे आपने अपने सुहाग की रक्षा की, वैसे ही सबके सुहाग की रक्षा करना।
3. द्रौपदी की कथा
एक बार अर्जुन तपस्या के लिए नीलगिरि पर्वत पर गए और उनके पीछे पांडवों पर अनेक संकट आ गए। चिंतित द्रौपदी ने भगवान श्रीकृष्ण से इन संकटों से मुक्ति का उपाय पूछा।
श्रीकृष्ण ने बताया कि यही प्रश्न माता पार्वती ने भगवान शिव से पूछा था, तब शिव जी ने उन्हें करवा चौथ का व्रत बताया था। श्रीकृष्ण के कहने पर द्रौपदी ने कार्तिक कृष्ण चतुर्थी को विधिपूर्वक यह व्रत किया, जिसके प्रभाव से पांडवों के संकट दूर हो गए।
4. गणेश जी की कहानी (मुख्य कथा के बाद)
एक गांव में एक अंधी बुढ़िया अपने बेटे और बहू के साथ रहती थी। वह रोज़ श्रद्धा से गणेश जी की पूजा करती थी। एक दिन गणेश जी प्रसन्न होकर प्रकट हुए और बोले, “माई, जो चाहे मांग ले।”
बुढ़िया ने बेटे-बहू से सलाह की। बेटे ने कहा धन मांगो, बहू ने कहा पोता मांगो, और बुढ़िया स्वयं अपनी आंखें मांगना चाहती थी। तब उसने गणेश जी से कहा, “हे प्रभु, मुझे ऐसा वर दो कि मैं अपने पोते को सोने के कटोरे में दूध पीते देखूं, घर में धन-धान्य रहे, शरीर निरोगी रहे और सबका सुहाग अमर रहे।”
गणेश जी मुस्कुराए और बोले, “माई, तूने तो एक ही वर में सब कुछ मांग लिया,” और ‘तथास्तु’ कहकर अंतर्धान हो गए। बुढ़िया की आंखें लौट आईं और उसका घर सुख-समृद्धि से भर गया। हे गणेश जी, जैसे बुढ़िया माई को दिया, वैसे सबको देना।
करवा अखंड सौभाग्य का प्रतीक है; बायना से बड़ों का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
मिट्टी के करवे में जल भरें, ढक्कन पर चीनी/चावल रखें और रोली से टीका लगाकर पूजें; कथा के बाद सास को बायना (वस्त्र, श्रृंगार, मिठाई) देकर आशीर्वाद लें।
सामग्री: मिट्टी का करवा (ढक्कन सहित), रोली/कुमकुम, मिठाई, सोलह श्रृंगार सामग्री
कदलीगर्भसम्भूतं कर्पूरं तु प्रदीपितम्। आरार्तिक्यमहं कुर्वे पश्य मे वरदा भव॥
ॐ शिवायै नमः। आरार्तिक्यं समर्पयामि॥
कदली-गर्भ से उत्पन्न, प्रज्वलित कपूर से मैं आरती करता/करती हूँ — मेरी ओर देखें और वर देने वाले हों।
कपूर या घी की आरती थाली को देवता के चरणों पर 4 बार, नाभि पर 2 बार, मुख पर 1 बार और समस्त अंगों पर 7 बार घुमाएं; घंटी बजाते हुए आरती गाएं।
सामग्री: आरती की थाली, कपूर, घंटी
ॐ सोमाय नमः। अर्घ्यं समर्पयामि॥
चन्द्रदेव को अर्घ्य अर्पित कर सौभाग्य की कामना करती हूँ।
चन्द्रोदय पर छलनी से पहले चन्द्रमा और फिर पति का मुख देखें; करवे के जल से चन्द्रमा को अर्घ्य दें; पति के हाथ से जल ग्रहण कर व्रत खोलें।
सामग्री: छलनी, मिट्टी का करवा (ढक्कन सहित), घी का दीपक व रुई की बत्ती
नानासुगन्धपुष्पाणि यथाकालोद्भवानि च। पुष्पाञ्जलिर्मया दत्तो गृहाण परमेश्वरि॥
ॐ शिवायै नमः। मन्त्रपुष्पाञ्जलिं समर्पयामि॥
ऋतु अनुसार खिले अनेक सुगंधित पुष्पों की यह पुष्पांजलि मैंने दी है — हे परमेश्वर, स्वीकार करें।
दोनों हाथों की अंजलि में पुष्प लेकर खड़े होकर देवता के चरणों में अर्पित करें।
सामग्री: ताजे पुष्प
यानि कानि च पापानि जन्मान्तरकृतानि च। तानि सर्वाणि नश्यन्तु प्रदक्षिणपदे पदे॥
ॐ शिवायै नमः। प्रदक्षिणां समर्पयामि॥
पिछले जन्मों में किए गए जो भी पाप हैं, वे प्रदक्षिणा के प्रत्येक पग के साथ नष्ट हो जाएं।
अपने स्थान पर दाहिनी ओर घूमकर (या प्रतिमा के चारों ओर) प्रदक्षिणा करें — संख्या: 1 (देवी)।
नमः सर्वहितार्थाय जगदाधारहेतवे। साष्टाङ्गोऽयं प्रणामस्ते प्रयत्नेन मया कृतः॥
ॐ शिवायै नमः। नमस्कारान् समर्पयामि॥
सबके हित के लिए स्थित, जगत के आधार आपको नमस्कार — यह साष्टांग प्रणाम मैंने प्रयत्नपूर्वक किया है।
साष्टांग (या हाथ जोड़कर सिर झुकाकर) प्रणाम करें।
आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम्। पूजां चैव न जानामि क्षमस्व परमेश्वरि॥ मन्त्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं सुरेश्वरि। यत्पूजितं मया देवि परिपूर्णं तदस्तु मे॥
अनेन पूजनेन शिवा देवी प्रीयताम्, न मम॥
मैं आवाहन, विसर्जन और पूजा की विधि नहीं जानता/जानती — क्षमा करें। मंत्र, क्रिया और भक्ति में जो कमी रही, उसके बावजूद मेरी पूजा परिपूर्ण हो। इस पूजा से देवता प्रसन्न हों; इसका फल मेरा नहीं, उन्हीं का है।
हाथ जोड़कर पूजा में हुई भूलों हेतु क्षमा मांगें; अंत में जल छोड़ते हुए पूजा का फल देवता को अर्पित करें।
सामग्री: जल पात्र (लोटा) व आचमनी
प्रसाद आदरपूर्वक स्वयं ग्रहण करें और परिवारजनों में बांटें।
चरणामृत/प्रसाद स्वयं ग्रहण करें और परिवारजनों में वितरित करें।
सामग्री: नैवेद्य (मिठाई/भोग)
यान्तु देवगणाः सर्वे पूजामादाय मामकीम्। इष्टकामसमृद्ध्यर्थं पुनरागमनाय च॥
सभी देवगण मेरी पूजा स्वीकार कर अपने धाम जाएं — मेरी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए और पुनः आगमन के लिए।
अक्षत छोड़ते हुए आवाहित देवताओं को आदरपूर्वक विदा करें। (स्थापित मूर्ति का विसर्जन नहीं होता — केवल आवाहित शक्ति का।)
सामग्री: अक्षत (साबुत चावल)
यह पाठ कार्यपुस्तिका संस्करण से है; परिवार व क्षेत्र की परंपरा के अनुसार विधि भिन्न हो सकती है।
जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी। तुमको निशदिन ध्यावत, हरि ब्रह्मा शिवरी॥ जय अम्बे गौरी॥ मांग सिंदूर विराजत, टीको मृगमद को। उज्ज्वल से दोउ नैना, चंद्रवदन नीको॥ जय अम्बे गौरी॥ कनक समान कलेवर, रक्ताम्बर राजे। रक्तपुष्प गल माला, कंठन पर साजे॥ जय अम्बे गौरी॥ केहरि वाहन राजत, खड्ग खप्पर धारी। सुर-नर-मुनिजन सेवत, तिनके दुःखहारी॥ जय अम्बे गौरी॥ कानन कुण्डल शोभित, नासाग्रे मोती। कोटिक चंद्र दिवाकर, सम राजत ज्योति॥ जय अम्बे गौरी॥ शुम्भ-निशुम्भ बिदारे, महिषासुर घाती। धूम्र विलोचन नैना, निशिदिन मदमाती॥ जय अम्बे गौरी॥ चंड मुण्ड संहारे, शोणित बीज हरे। मधु कैटभ दोउ मारे, सुर भय बिन करे॥ जय अम्बे गौरी॥ ब्रह्माणी, रुद्राणी, तुम कमला रानी। आगम-निगम बखानी, तुम शिव पटरानी॥ जय अम्बे गौरी॥ चौंसठ योगिनी मंगल गावत, नृत्य करत भैरू। बाजत ताल मृदंगा, अरु बाजत डमरू॥ जय अम्बे गौरी॥ तुम ही जग की माता, तुम ही हो भरता। भक्तन की दुःख हरता, सुख सम्पत्ति करता॥ जय अम्बे गौरी॥ भुजा चार अति शोभित, खड्ग खप्पर धारी। मनवांछित फल पावत, सेवत नर नारी॥ जय अम्बे गौरी॥ कंचन थाल विराजत, अगर कपूर की बाती। श्री मालकेतु में राजत, कोटि रतन ज्योति॥ जय अम्बे गौरी॥ श्री अम्बेजी की आरती, जो कोई नर गावे। कहत शिवानंद स्वामी, मनवांछित फल पावे॥ जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी॥