🔥 अग्नि सुरक्षा: दीपक, कपूर, धूप या हवन की अग्नि जलाते समय सावधानी रखें। बच्चे केवल वयस्कों की देखरेख में भाग लें। जलती अग्नि को कभी अकेला न छोड़ें, पास में पानी रखें और पर्दे, कपड़े व कागज़ दूर रखें। हवन खुले या हवादार स्थान पर करें।
पूजा मुहूर्त · मंगलवार, 17 अगस्त 2027
राखी बांधने का मुहूर्त: 5:51 AM – 12:59 PM
नई दिल्ली के अनुसार। दूसरे शहरों में समय कुछ मिनट अलग हो सकता है — स्थानीय पंचांग या पुरोहित से पुष्टि करें।
हर श्लोक के बाद 2 सेकंड का विराम · बीच में रोकें, आगे या पीछे जाएँ
1. पवित्रीकरण
ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा।
यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः॥
व्यक्ति पवित्र हो या अपवित्र, किसी भी अवस्था में हो — जो कमलनयन भगवान का स्मरण करता है, वह भीतर और बाहर से शुद्ध हो जाता है। कमलनयन प्रभु हमें पवित्र करें।
बाएं हाथ में जल लेकर दाएं हाथ की अंगुलियों से अपने ऊपर, आसन पर तथा पूजा-सामग्री पर जल छिड़कें।
जो शुभ करती है, कल्याण, आरोग्य और धन-सम्पदा देती है तथा शत्रु-बुद्धि का नाश करती है — उस दीप-ज्योति को नमस्कार।
घी का दीपक जलाकर देवता के दाहिनी ओर (आपकी बाईं ओर) रखें; तेल का दीपक हो तो देवता के बाईं ओर। दीपक को प्रणाम करें।
सामग्री: घी का दीपक व रुई की बत्ती, माचिस
3. संकल्प
ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः। श्रीमद्भगवतो महापुरुषस्य विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्य अद्य श्रीब्रह्मणो द्वितीयपरार्धे श्रीश्वेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरे अष्टाविंशतितमे कलियुगे कलिप्रथमचरणे जम्बूद्वीपे भरतखण्डे भारतवर्षे आर्यावर्तैकदेशे (नगर/गांव का नाम) नगरे (संवत्सर का नाम (60 वर्ष चक्र)) नामसंवत्सरे (अयन) (ऋतु (संधि सहित)) (हिंदू मास) मासे (पक्ष) पक्षे (तिथि) तिथौ (वार) वासरे (गोत्र) गोत्रोत्पन्नः/उत्पन्ना (पूजा करने वाले का नाम) नामाहं भ्रातृरक्षार्थं रक्षाबन्धनं करिष्ये॥
कोष्ठक ( ) वाले शब्द — पंचांग व गोत्र — संकल्प में आप स्वयं बोलें; ▶ संकल्प सुनें में पंडित जी इन्हें पूछेंगे। नाम व नगर प्रोफ़ाइल से भरे जाते हैं।
मैं (नाम, गोत्र) इस काल, इस स्थान पर, इस उद्देश्य से यह पूजा करने का संकल्प लेता/लेती हूँ।
दाहिने हाथ में जल, अक्षत, पुष्प और दक्षिणा लेकर संकल्प-वाक्य पढ़ें (ऐप आपके नगर, तिथि, नाम व गोत्र से स्वतः भरता है), अंत में जल भूमि या ताम्रपात्र में छोड़ दें।
सामग्री: जल पात्र (लोटा) व आचमनी, अक्षत (साबुत चावल), ताजे पुष्प, दक्षिणा (सिक्का/मुद्रा)
4. गणेश स्मरण
वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ।
निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥
ॐ गं गणपतये नमः। गन्धाक्षतपुष्पाणि समर्पयामि॥
हे वक्र सूंड वाले, विशाल शरीर वाले, करोड़ों सूर्यों के समान तेजस्वी देव! मेरे सभी कार्य सदा निर्विघ्न करें।
किसी भी पूजा से पहले विघ्नहर्ता गणेश जी का ध्यान करें और अक्षत-पुष्प अर्पित करें। (गणेश पूजा में यह चरण मुख्य पूजा में समाहित है।)
पहली राखी अपने इष्टदेव (गणेश/कृष्ण/हनुमान) को अर्पित करें।
सामग्री: राखी
6. तिलक व अक्षत
तिलक से मंगल-कामना।
भाई को पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके बिठाएं; सिर पर रूमाल रखें और रोली-अक्षत का तिलक लगाएं।
सामग्री: रोली/कुमकुम, अक्षत (साबुत चावल)
7. रक्षासूत्र बंधन
येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः।
तेन त्वामनुबध्नामि रक्षे मा चल मा चल॥
जिस रक्षा-सूत्र से महाबली दानवराज बलि बांधे गए थे, उसी से मैं तुम्हें बांधती हूँ — हे रक्षे! तुम स्थिर रहना, विचलित न होना।
भाई की दाहिनी कलाई पर राखी बांधते हुए मंत्र पढ़ें।
सामग्री: राखी
8. भाई की आरती व मिठाई
आरती और मिठाई से स्नेह व मंगल-कामना।
दीपक से भाई की आरती उतारें, मिठाई खिलाएं; भाई उपहार देकर रक्षा का वचन दे।
सामग्री: आरती की थाली, घी का दीपक व रुई की बत्ती, मिठाई
यह पाठ कार्यपुस्तिका संस्करण से है; परिवार व क्षेत्र की परंपरा के अनुसार विधि भिन्न हो सकती है।
॥ श्री कृष्ण जी की आरती ॥
आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥
गले में बैजंती माला, बजावै मुरली मधुर बाला।
श्रवण में कुण्डल झलकाला, नंद के आनंद नंदलाला।
गगन सम अंग कांति काली, राधिका चमक रही आली।
लतन में ठाढ़े बनमाली,
भ्रमर सी अलक, कस्तूरी तिलक, चंद्र सी झलक,
ललित छवि श्यामा प्यारी की॥ श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥
आरती कुंजबिहारी की...
कनकमय मोर मुकुट बिलसै, देवता दरसन को तरसैं।
गगन सों सुमन रासि बरसै,
बजे मुरचंग, मधुर मिरदंग, ग्वालिन संग,
अतुल रति गोप कुमारी की॥ श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥
आरती कुंजबिहारी की...
जहां ते प्रकट भई गंगा, सकल मन हारिणि श्री गंगा।
स्मरन ते होत मोह भंगा,
बसी शिव सीस, जटा के बीच, हरै अघ कीच,
चरन छवि श्रीबनवारी की॥ श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥
आरती कुंजबिहारी की...
चमकती उज्ज्वल तट रेनू, बज रही वृंदावन बेनू।
चहुं दिसि गोपि ग्वाल धेनू,
हंसत मृदु मंद, चांदनी चंद, कटत भव फंद,
टेर सुन दीन दुखारी की॥ श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥
आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥