🔥 अग्नि सुरक्षा: दीपक, कपूर, धूप या हवन की अग्नि जलाते समय सावधानी रखें। बच्चे केवल वयस्कों की देखरेख में भाग लें। जलती अग्नि को कभी अकेला न छोड़ें, पास में पानी रखें और पर्दे, कपड़े व कागज़ दूर रखें। हवन खुले या हवादार स्थान पर करें।
हर श्लोक के बाद 2 सेकंड का विराम · बीच में रोकें, आगे या पीछे जाएँ
1. पवित्रीकरण
ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा।
यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः॥
व्यक्ति पवित्र हो या अपवित्र, किसी भी अवस्था में हो — जो कमलनयन भगवान का स्मरण करता है, वह भीतर और बाहर से शुद्ध हो जाता है। कमलनयन प्रभु हमें पवित्र करें।
बाएं हाथ में जल लेकर दाएं हाथ की अंगुलियों से अपने ऊपर, आसन पर तथा पूजा-सामग्री पर जल छिड़कें।
जो शुभ करती है, कल्याण, आरोग्य और धन-सम्पदा देती है तथा शत्रु-बुद्धि का नाश करती है — उस दीप-ज्योति को नमस्कार।
घी का दीपक जलाकर देवता के दाहिनी ओर (आपकी बाईं ओर) रखें; तेल का दीपक हो तो देवता के बाईं ओर। दीपक को प्रणाम करें।
सामग्री: घी का दीपक व रुई की बत्ती, माचिस
3. संकल्प
ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः। श्रीमद्भगवतो महापुरुषस्य विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्य अद्य श्रीब्रह्मणो द्वितीयपरार्धे श्रीश्वेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरे अष्टाविंशतितमे कलियुगे कलिप्रथमचरणे जम्बूद्वीपे भरतखण्डे भारतवर्षे आर्यावर्तैकदेशे (नगर/गांव का नाम) नगरे (संवत्सर का नाम (60 वर्ष चक्र)) नामसंवत्सरे (अयन) (ऋतु (संधि सहित)) (हिंदू मास) मासे (पक्ष) पक्षे (तिथि) तिथौ (वार) वासरे (गोत्र) गोत्रोत्पन्नः/उत्पन्ना (पूजा करने वाले का नाम) नामाहं श्रीजगदम्बाप्रीत्यर्थं कुमारीपूजनं करिष्ये॥
कोष्ठक ( ) वाले शब्द — पंचांग व गोत्र — संकल्प में आप स्वयं बोलें; ▶ संकल्प सुनें में पंडित जी इन्हें पूछेंगे। नाम व नगर प्रोफ़ाइल से भरे जाते हैं।
मैं (नाम, गोत्र) इस काल, इस स्थान पर, इस उद्देश्य से यह पूजा करने का संकल्प लेता/लेती हूँ।
दाहिने हाथ में जल, अक्षत, पुष्प और दक्षिणा लेकर संकल्प-वाक्य पढ़ें (ऐप आपके नगर, तिथि, नाम व गोत्र से स्वतः भरता है), अंत में जल भूमि या ताम्रपात्र में छोड़ दें।
सामग्री: जल पात्र (लोटा) व आचमनी, अक्षत (साबुत चावल), ताजे पुष्प, दक्षिणा (सिक्का/मुद्रा)
4. आमंत्रण व स्वागत
ॐ आगच्छ कुमारिके, गृहाण मत्कृतां पूजाम्॥
हे कुमारिके! पधारो और मेरे द्वारा की गई पूजा स्वीकार करो।
9 कन्याओं (लगभग 2–10 वर्ष) और 1 बालक (लांगुरा/बटुक भैरव) को घर के द्वार पर तिलक लगाकर सम्मानपूर्वक अंदर बुलाएं। आयु अनुसार स्वरूप (देवी भागवत परंपरा): 2 वर्ष कुमारी, 3 त्रिमूर्ति, 4 कल्याणी, 5 रोहिणी, 6 कालिका, 7 चण्डिका, 8 शाम्भवी, 9 दुर्गा, 10 सुभद्रा।
5. चरण प्रक्षालन
ॐ कुमारिकायै नमः। पादप्रक्षालनं समर्पयामि॥
कुमारी-स्वरूपा देवी को नमस्कार कर चरण प्रक्षालन करता/करती हूँ।
सभी कन्याओं और बालक के पैर स्वच्छ जल से धोकर साफ वस्त्र से पोंछें — यह सर्वोच्च सम्मान का प्रतीक है।
सामग्री: जल पात्र (लोटा) व आचमनी
6. आसन पर बिठाना
ॐ कुमारिकायै नमः। आसनं समर्पयामि॥
कुमारी-स्वरूपा देवी को आसन अर्पित करता/करती हूँ।
स्वच्छ आसन पर कन्याओं को पंक्ति में और बटुक को अलग आसन पर बिठाएं।
सामग्री: आसन (कुश/ऊनी)
7. तिलक व अक्षत
या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
जो देवी सब प्राणियों में माता रूप से स्थित हैं, उन्हें बार-बार नमस्कार। (देवी सूक्त)
प्रत्येक कन्या के मस्तक पर रोली-कुमकुम का तिलक और अक्षत लगाएं — यह स्मरण करते हुए कि वे साक्षात् मातृशक्ति का रूप हैं।
सामग्री: रोली/कुमकुम, अक्षत (साबुत चावल)
8. रक्षासूत्र व श्रृंगार
ॐ कुमारिकायै नमः। रक्षासूत्रं श्रृङ्गारद्रव्याणि च समर्पयामि॥
कुमारी-स्वरूपा देवी को रक्षा-सूत्र और श्रृंगार अर्पित करता/करती हूँ।
कलाई पर मौली बांधें; यथाशक्ति चुनरी, चूड़ी या छोटा श्रृंगार भेंट करें।
नवार्ण मंत्र सहित देवी स्वरूपा कन्याओं को पुष्प अर्पित करता/करती हूँ।
पुष्प अर्पित कर हाथ जोड़ें और नौ देवी-स्वरूपों का स्मरण करें।
सामग्री: ताजे पुष्प
10. भोजन कराना
ॐ अन्नपूर्णायै नमः। इदं नैवेद्यं निवेदयामि॥
अन्नपूर्णा के नाम से यह भोजन निवेदित करता/करती हूँ।
पारंपरिक भोग — हलवा, पूरी और काले चने — प्रेमपूर्वक परोसें; बटुक को भी समान भोजन दें।
सामग्री: हलवा-पूरी-काले चने
11. दक्षिणा व उपहार
ॐ कुमारिकायै नमः। दक्षिणां समर्पयामि॥
कुमारी-स्वरूपा देवी को दक्षिणा अर्पित करता/करती हूँ।
भोजन के बाद यथाशक्ति दक्षिणा और उपहार (वस्त्र, खिलौने, पुस्तकें) भेंट करें।
सामग्री: दक्षिणा (सिक्का/मुद्रा)
12. चरण-स्पर्श व विदाई
ॐ जगदम्बे नमस्तुभ्यं भूयो भूयो नमो नमः॥
हे जगदम्बा! आपको बार-बार नमस्कार।
कन्याओं और बटुक के चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लें और उन्हें सम्मानपूर्वक द्वार तक छोड़ने जाएं।
यह पाठ कार्यपुस्तिका संस्करण से है; परिवार व क्षेत्र की परंपरा के अनुसार विधि भिन्न हो सकती है।
॥ श्री दुर्गा माता की आरती ॥
जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी।
तुमको निशदिन ध्यावत, हरि ब्रह्मा शिवरी॥ जय अम्बे गौरी॥
मांग सिंदूर विराजत, टीको मृगमद को।
उज्ज्वल से दोउ नैना, चंद्रवदन नीको॥ जय अम्बे गौरी॥
कनक समान कलेवर, रक्ताम्बर राजे।
रक्तपुष्प गल माला, कंठन पर साजे॥ जय अम्बे गौरी॥
केहरि वाहन राजत, खड्ग खप्पर धारी।
सुर-नर-मुनिजन सेवत, तिनके दुःखहारी॥ जय अम्बे गौरी॥
कानन कुण्डल शोभित, नासाग्रे मोती।
कोटिक चंद्र दिवाकर, सम राजत ज्योति॥ जय अम्बे गौरी॥
शुम्भ-निशुम्भ बिदारे, महिषासुर घाती।
धूम्र विलोचन नैना, निशिदिन मदमाती॥ जय अम्बे गौरी॥
चंड मुण्ड संहारे, शोणित बीज हरे।
मधु कैटभ दोउ मारे, सुर भय बिन करे॥ जय अम्बे गौरी॥
ब्रह्माणी, रुद्राणी, तुम कमला रानी।
आगम-निगम बखानी, तुम शिव पटरानी॥ जय अम्बे गौरी॥
चौंसठ योगिनी मंगल गावत, नृत्य करत भैरू।
बाजत ताल मृदंगा, अरु बाजत डमरू॥ जय अम्बे गौरी॥
तुम ही जग की माता, तुम ही हो भरता।
भक्तन की दुःख हरता, सुख सम्पत्ति करता॥ जय अम्बे गौरी॥
भुजा चार अति शोभित, खड्ग खप्पर धारी।
मनवांछित फल पावत, सेवत नर नारी॥ जय अम्बे गौरी॥
कंचन थाल विराजत, अगर कपूर की बाती।
श्री मालकेतु में राजत, कोटि रतन ज्योति॥ जय अम्बे गौरी॥
श्री अम्बेजी की आरती, जो कोई नर गावे।
कहत शिवानंद स्वामी, मनवांछित फल पावे॥ जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी॥