हनुमान पूजा
- प्रिय भोग:
- गुड़-चना, बूंदी लड्डू
- प्रिय वार:
- मंगलवार, शनिवार
- समय:
- प्रातः स्नान के बाद; देवता का प्रिय वार श्रेष्ठ
पूजन सामग्री: आवश्यक वस्तुओं की सूची
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श्री हनुमान चालीसा
॥ दोहा ॥ श्रीगुरु चरन सरोज रज, निज मनु मुकुरु सुधारि। बरनउँ रघुबर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि॥ बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन-कुमार। बल बुद्धि बिद्या देहु मोहिं, हरहु कलेस बिकार॥ ॥ चौपाई ॥ जय हनुमान ज्ञान गुन सागर। जय कपीस तिहुँ लोक उजागर॥ राम दूत अतुलित बल धामा। अंजनि पुत्र पवनसुत नामा॥ महाबीर बिक्रम बजरंगी। कुमति निवार सुमति के संगी॥ कंचन बरन बिराज सुबेसा। कानन कुंडल कुंचित केसा॥ हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजै। कांधे मूंज जनेऊ साजै॥ संकर सुवन केसरीनंदन। तेज प्रताप महा जग बन्दन॥ विद्यावान गुणी अति चातुर। राम काज करिबे को आतुर॥ प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया। राम लखन सीता मन बसिया॥ सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा। बिकट रूप धरि लंक जरावा॥ भीम रूप धरि असुर संहारे। रामचन्द्र के काज संवारे॥ लाय सजीवन लखन जियाये। श्रीरघुबीर हरषि उर लाये॥ रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई। तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई॥ सहस बदन तुम्हरो जस गावैं। अस कहि श्रीपति कण्ठ लगावैं॥ सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा। नारद सारद सहित अहीसा॥ जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते। कबि कोबिद कहि सके कहाँ ते॥ तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा। राम मिलाय राज पद दीन्हा॥ तुम्हरो मन्त्र बिभीषन माना। लंकेश्वर भए सब जग जाना॥ जुग सहस्र जोजन पर भानू। लील्यो ताहि मधुर फल जानू॥ प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं। जलधि लांघि गये अचरज नाहीं॥ दुर्गम काज जगत के जेते। सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते॥ राम दुआरे तुम रखवारे। होत न आज्ञा बिनु पैसारे॥ सब सुख लहै तुम्हारी सरना। तुम रक्षक काहू को डर ना॥ आपन तेज सम्हारो आपै। तीनों लोक हाँक तें कांपै॥ भूत पिशाच निकट नहिं आवै। महाबीर जब नाम सुनावै॥ नासै रोग हरै सब पीरा। जपत निरंतर हनुमत बीरा॥ संकट तें हनुमान छुड़ावै। मन क्रम बचन ध्यान जो लावै॥ सब पर राम तपस्वी राजा। तिन के काज सकल तुम साजा॥ और मनोरथ जो कोई लावै। सोइ अमित जीवन फल पावै॥ चारों जुग परताप तुम्हारा। है परसिद्ध जगत उजियारा॥ साधु सन्त के तुम रखवारे। असुर निकन्दन राम दुलारे॥ अष्टसिद्धि नौ निधि के दाता। अस बर दीन्ह जानकी माता॥ राम रसायन तुम्हरे पासा। सदा रहो रघुपति के दासा॥ तुम्हरे भजन राम को पावै। जनम जनम के दुख बिसरावै॥ अंत काल रघुबर पुर जाई। जहाँ जन्म हरि-भक्त कहाई॥ और देवता चित्त न धरई। हनुमत सेइ सर्व सुख करई॥ संकट कटै मिटै सब पीरा। जो सुमिरै हनुमत बलबीरा॥ जय जय जय हनुमान गोसाईं। कृपा करहु गुरुदेव की नाईं॥ जो सत बार पाठ कर कोई। छूटहि बंदि महा सुख होई॥ जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा। होय सिद्धि साखी गौरीसा॥ तुलसीदास सदा हरि चेरा। कीजै नाथ हृदय महँ डेरा॥ ॥ दोहा ॥ पवनतनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप। राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप॥
संकटमोचन हनुमान अष्टक
बाल समय रबि भक्षि लियो तब, तीनहुँ लोक भयो अँधियारो। ताहि सों त्रास भयो जग को, यह संकट काहु सों जात न टारो॥ देवन आनि करी बिनती तब, छाँड़ि दियो रबि कष्ट निवारो। को नहिं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो॥१॥ बालि की त्रास कपीस बसै गिरि, जात महाप्रभु पंथ निहारो। चौंकि महामुनि साप दियो तब, चाहिय कौन बिचार बिचारो॥ कै द्विज रूप लिवाय महाप्रभु, सो तुम दास के सोक निवारो। को नहिं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो॥२॥ अंगद के सँग लेन गये सिय, खोज कपीस यह बैन उचारो। जीवत ना बचिहौ हम सो जु, बिना सुधि लाय इहाँ पगु धारो॥ हेरि थके तट सिंधु सबै तब, लाय सिया-सुधि प्रान उबारो। को नहिं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो॥३॥ रावन त्रास दई सिय को सब, राक्षसि सों कहि सोक निवारो। ताहि समय हनुमान महाप्रभु, जाय महा रजनीचर मारो॥ चाहत सीय असोक सों आगि सु, दै प्रभु मुद्रिका सोक निवारो। को नहिं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो॥४॥ बान लग्यो उर लछिमन के तब, प्रान तजे सुत रावन मारो। लै गृह बैद्य सुषेन समेत, तबै गिरि द्रोन सु बीर उपारो॥ आनि सजीवन हाथ दई तब, लछिमन के तुम प्रान उबारो। को नहिं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो॥५॥ रावन जुद्ध अजान कियो तब, नाग कि फाँस सबै सिर डारो। श्रीरघुनाथ समेत सबै दल, मोह भयो यह संकट भारो॥ आनि खगेस तबै हनुमान जु, बंधन काटि सुत्रास निवारो। को नहिं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो॥६॥ बंधु समेत जबै अहिरावन, लै रघुनाथ पताल सिधारो। देबिहिं पूजि भली बिधि सों बलि, देउ सबै मिलि मंत्र बिचारो॥ जाय सहाय भयो तब ही, अहिरावन सैन्य समेत सँहारो। को नहिं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो॥७॥ काज किये बड़ देवन के तुम, बीर महाप्रभु देखि बिचारो। कौन सो संकट मोर गरीब को, जो तुमसे नहिं जात है टारो॥ बेगि हरो हनुमान महाप्रभु, जो कछु संकट होय हमारो। को नहिं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो॥८॥ || दोहा || लाल देह लाली लसे, अरु धरि लाल लँगूर। बज्र देह दानव दलन, जय जय जय कपि सूर॥
॥ श्री हनुमान जी की आरती ॥
आरती कीजै हनुमान लला की। दुष्ट दलन रघुनाथ कला की॥ जाके बल से गिरिवर कांपे। रोग दोष जाके निकट न झांके॥ अंजनि पुत्र महा बलदाई। संतन के प्रभु सदा सहाई॥ आरती कीजै... दे बीरा रघुनाथ पठाए। लंका जारि सिया सुधि लाए॥ लंका सो कोट समुद्र सी खाई। जात पवनसुत बार न लाई॥ आरती कीजै... लंका जारि असुर संहारे। सियारामजी के काज संवारे॥ लक्ष्मण मूर्छित पड़े सकारे। आनि संजीवन प्राण उबारे॥ आरती कीजै... पैठि पताल तोरि जमकारे। अहिरावण की भुजा उखारे॥ बाईं भुजा असुर दल मारे। दाहिने भुजा संतजन तारे॥ आरती कीजै... सुर नर मुनि जन आरती उतारें। जय जय जय हनुमान उचारें॥ कंचन थार कपूर लौ छाई। आरती करत अंजना माई॥ आरती कीजै... जो हनुमानजी की आरती गावै। बसि बैकुण्ठ परम पद पावै॥ लंक विध्वंस किए रघुराई। तुलसीदास स्वामी कीर्ति गाई॥ आरती कीजै हनुमान लला की। दुष्ट दलन रघुनाथ कला की॥