नवरात्रि की पूर्णता और देवी-कृपा हेतु नवार्ण मंत्र से हवन।
अवसर:
नवरात्रि नवमी / अष्टमी
समय:
नवमी तिथि — मध्याह्न से पूर्व श्रेष्ठ
पुरोहित:
वैकल्पिक (सप्तशती होम हेतु हाँ)
पूजन सामग्री: आवश्यक वस्तुओं की सूची
0 / 33 वस्तुएँ तैयार
चरणबद्ध विधि
🔥 अग्नि सुरक्षा: दीपक, कपूर, धूप या हवन की अग्नि जलाते समय सावधानी रखें। बच्चे केवल वयस्कों की देखरेख में भाग लें। जलती अग्नि को कभी अकेला न छोड़ें, पास में पानी रखें और पर्दे, कपड़े व कागज़ दूर रखें। हवन खुले या हवादार स्थान पर करें।
हर श्लोक के बाद 2 सेकंड का विराम · बीच में रोकें, आगे या पीछे जाएँ
1. पवित्रीकरण
ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा।
यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः॥
व्यक्ति पवित्र हो या अपवित्र, किसी भी अवस्था में हो — जो कमलनयन भगवान का स्मरण करता है, वह भीतर और बाहर से शुद्ध हो जाता है। कमलनयन प्रभु हमें पवित्र करें।
बाएं हाथ में जल लेकर दाएं हाथ की अंगुलियों से अपने ऊपर, आसन पर तथा पूजा-सामग्री पर जल छिड़कें।
सामग्री: जल पात्र (लोटा) व आचमनी, गंगाजल
2. आचमन
ॐ केशवाय नमः। ॐ नारायणाय नमः। ॐ माधवाय नमः॥
ॐ हृषीकेशाय नमः। हस्तं प्रक्षालयामि॥
भगवान केशव, नारायण और माधव को नमस्कार करते हुए आंतरिक शुद्धि हेतु जल ग्रहण करता/करती हूँ; हृषीकेश के नाम से हाथ धोता/धोती हूँ।
दाहिने हाथ की हथेली (गोकर्ण मुद्रा) में थोड़ा जल लेकर एक-एक नाम के साथ तीन बार जल ग्रहण करें, फिर 'हृषीकेशाय नमः' बोलकर हाथ धो लें।
जो शुभ करती है, कल्याण, आरोग्य और धन-सम्पदा देती है तथा शत्रु-बुद्धि का नाश करती है — उस दीप-ज्योति को नमस्कार।
घी का दीपक जलाकर देवता के दाहिनी ओर (आपकी बाईं ओर) रखें; तेल का दीपक हो तो देवता के बाईं ओर। दीपक को प्रणाम करें।
सामग्री: घी का दीपक व रुई की बत्ती, माचिस
5. संकल्प
ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः। श्रीमद्भगवतो महापुरुषस्य विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्य अद्य श्रीब्रह्मणो द्वितीयपरार्धे श्रीश्वेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरे अष्टाविंशतितमे कलियुगे कलिप्रथमचरणे जम्बूद्वीपे भरतखण्डे भारतवर्षे आर्यावर्तैकदेशे (नगर/गांव का नाम) नगरे (संवत्सर का नाम (60 वर्ष चक्र)) नामसंवत्सरे (अयन) (ऋतु (संधि सहित)) (हिंदू मास) मासे (पक्ष) पक्षे (तिथि) तिथौ (वार) वासरे (गोत्र) गोत्रोत्पन्नः/उत्पन्ना (पूजा करने वाले का नाम) नामाहं श्रीदुर्गाप्रीत्यर्थं दुर्गाहोमं करिष्ये॥
कोष्ठक ( ) वाले शब्द — पंचांग व गोत्र — संकल्प में आप स्वयं बोलें; ▶ संकल्प सुनें में पंडित जी इन्हें पूछेंगे। नाम व नगर प्रोफ़ाइल से भरे जाते हैं।
मैं (नाम, गोत्र) इस काल, इस स्थान पर, इस उद्देश्य से यह पूजा करने का संकल्प लेता/लेती हूँ।
दाहिने हाथ में जल, अक्षत, पुष्प और दक्षिणा लेकर संकल्प-वाक्य पढ़ें (ऐप आपके नगर, तिथि, नाम व गोत्र से स्वतः भरता है), अंत में जल भूमि या ताम्रपात्र में छोड़ दें।
सामग्री: जल पात्र (लोटा) व आचमनी, अक्षत (साबुत चावल), ताजे पुष्प, दक्षिणा (सिक्का/मुद्रा)
6. गणेश स्मरण
वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ।
निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥
ॐ गं गणपतये नमः। गन्धाक्षतपुष्पाणि समर्पयामि॥
हे वक्र सूंड वाले, विशाल शरीर वाले, करोड़ों सूर्यों के समान तेजस्वी देव! मेरे सभी कार्य सदा निर्विघ्न करें।
किसी भी पूजा से पहले विघ्नहर्ता गणेश जी का ध्यान करें और अक्षत-पुष्प अर्पित करें। (गणेश पूजा में यह चरण मुख्य पूजा में समाहित है।)
शक्कर, मिठाइयां, दही, दूध, घी तथा भक्ष्य-भोज्य आहार रूपी यह नैवेद्य स्वीकार करें। पांचों प्राणों को यह आहुति समर्पित है।
भोग की थाली देवता के सामने रखें, उसके चारों ओर जल से घेरा बनाएं (विष्णु-कृष्ण-राम को तुलसी दल रखकर), फिर पंच-प्राणाहुति मंत्र बोलें।
सामग्री: नैवेद्य (मिठाई/भोग), जल पात्र (लोटा) व आचमनी
16. हवन सुरक्षा जांच
सुरक्षित व शुद्ध वातावरण में ही हवन करें।
हवन से पहले: हवादार स्थान, पास में पानी की बाल्टी/रेत, बच्चों व पालतू पशुओं को दूर रखें, सिंथेटिक वस्त्र न पहनें, मुंह से फूंक न मारें (पंखे का प्रयोग करें), आहुति केवल 'स्वाहा' उच्चारण पर दें।
सामग्री: जल पात्र (लोटा) व आचमनी
17. कुंड/वेदी पूजन
ॐ वेद्यै नमः। गन्धाक्षतपुष्पाणि समर्पयामि॥
यज्ञ-वेदी को नमस्कार कर उसका पूजन करता/करती हूँ।
हवन कुंड को गंगाजल से शुद्ध करें, उसमें रोली से स्वस्तिक बनाएं और चारों ओर कुशा रखें; कुंड पर अक्षत-पुष्प चढ़ाएं।
समिधा से अतिथि-रूप अग्नि की सेवा करो, घी से उन्हें जगाओ और उनमें हवि अर्पित करो। भली-भाँति प्रज्वलित, तेजस्वी जातवेद अग्नि को तीव्र घी अर्पित करो। हे अंगिरा अग्नि, हम समिधा और घी से आपको बढ़ाते हैं; हे सदा युवा, विशाल ज्योति से प्रकाशित हों।
आम की तीन समिधाएँ (लगभग 8 अंगुल लंबी) घी में डुबोकर रखें। हर मंत्र के 'स्वाहा' पर एक समिधा प्रज्वलित अग्नि में रखें।
सामग्री: आम की समिधा (सूखी लकड़ी), शुद्ध घी व स्रुवा (आहुति चम्मच)
हे अदिति, हे अनुमति, हे सरस्वती — इस यज्ञ की अनुमति दें। हे सविता देव, यज्ञ और यजमान को सौभाग्य की ओर प्रेरित करें; बुद्धि को पवित्र करने वाले दिव्य गन्धर्व हमारी बुद्धि पवित्र करें, और वाचस्पति हमारे अन्न को मधुर करें।
आचमनी से जल लेकर कुंड के चारों ओर छिड़कें: पहले मंत्र से दक्षिण में पश्चिम से पूर्व, दूसरे से पश्चिम में दक्षिण से उत्तर, तीसरे से उत्तर में पश्चिम से पूर्व, और चौथे मंत्र से पूर्व से आरंभ कर कुंड के चारों ओर एक परिक्रमा।
सामग्री: जल पात्र (लोटा) व आचमनी
21. अग्नि पूजन
ॐ अग्नये नमः। गन्धाक्षतपुष्पाणि समर्पयामि॥
अग्निदेव को गंध-अक्षत-पुष्प अर्पित करता/करती हूँ।
प्रज्वलित अग्नि को गंध, अक्षत, पुष्प अर्पित कर प्रणाम करें।
सामग्री: चंदन, अक्षत (साबुत चावल), ताजे पुष्प
22. आघार-आज्यभाग आहुति
ॐ प्रजापतये स्वाहा। इदं प्रजापतये न मम॥
ॐ इन्द्राय स्वाहा। इदं इन्द्राय न मम॥
ॐ अग्नये स्वाहा। इदं अग्नये न मम॥
ॐ सोमाय स्वाहा। इदं सोमाय न मम॥
प्रजापति, इन्द्र, अग्नि और सोम को यह आहुति समर्पित है — यह उनकी है, मेरी नहीं।
स्रुवा से घी की चार आहुतियां दें — प्रत्येक 'स्वाहा' पर एक आहुति; 'इदं ... न मम' बोलते हुए स्रुवा का शेष घी अलग पात्र में टपकाएं।
सामग्री: शुद्ध घी व स्रुवा (आहुति चम्मच)
23. व्याहृति आहुति
ॐ भूः स्वाहा। इदं अग्नये न मम॥
ॐ भुवः स्वाहा। इदं वायवे न मम॥
ॐ स्वः स्वाहा। इदं सूर्याय न मम॥
ॐ भूर्भुवः स्वः स्वाहा। इदं प्रजापतये न मम॥
भूलोक के अग्नि, अंतरिक्ष के वायु और स्वर्ग के सूर्य को आहुति — यह उनकी है, मेरी नहीं। चौथी आहुति तीनों लोकों के स्वामी प्रजापति को।
तीन महाव्याहृतियों से और फिर चौथी (समस्त व्याहृति) आहुति प्रजापति को घी से दें।
सामग्री: शुद्ध घी व स्रुवा (आहुति चम्मच)
24. गायत्री आहुति
ॐ भूर्भुवः स्वः। तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि।
धियो यो नः प्रचोदयात् स्वाहा। इदं सवित्रे न मम॥
हम सविता देव के उस वरणीय तेज का ध्यान करते हैं, जो हमारी बुद्धि को प्रेरित करे। यह आहुति सविता की है, मेरी नहीं।
गायत्री मंत्र से घी या शाकल्य की कम से कम 3 आहुतियाँ दें (विस्तृत हवन में 11, 24 या 108)।
सामग्री: शुद्ध घी व स्रुवा (आहुति चम्मच), हवन सामग्री (शाकल्य)
25. गणेश आहुति
ॐ गं गणपतये स्वाहा। इदं गणपतये न मम॥
गणपति को आहुति — यह उनकी है, मेरी नहीं।
हवन सामग्री व घी से गणेश जी को 21 (संक्षिप्त में 11) आहुतियां दें।
सामग्री: हवन सामग्री (शाकल्य), शुद्ध घी व स्रुवा (आहुति चम्मच)
जातवेद अग्नि शत्रुता को भस्म करें और हमें सब कठिनाइयों से ऐसे पार कराएँ जैसे नाव नदी के पार ले जाती है। अग्नि-वर्णा, तप से प्रज्वलित, कर्मफल देने वाली दुर्गा देवी की मैं शरण लेता हूँ। हे अग्नि, हमें कल्याण के साथ संकटों से पार ले चलें, हमारी भूमि विस्तृत हो और संतान को सुख मिले; हमारे शरीरों के रक्षक बनें; युद्ध जीतने वाले उग्र अग्नि को हम बुलाते हैं; हमें सौभाग्य दें। अंत में दुर्गा गायत्री: हम कात्यायनी को जानते हैं, कन्याकुमारी का ध्यान करते हैं; वे दुर्गा हमें प्रेरित करें।
नवार्ण मंत्र की आहुतियों से पहले दुर्गा सूक्त के सातों मंत्र पढ़ें; हर मंत्र के अंत में 'स्वाहा' बोलकर आहुति दें। अंत में दुर्गा गायत्री से एक आहुति।
सामग्री: शुद्ध घी व स्रुवा (आहुति चम्मच), हवन सामग्री (शाकल्य)
27. मुख्य देवता आहुति
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे स्वाहा॥
मुख्य देवता को आहुति — यह उनकी है, मेरी नहीं।
मुख्य देवता के हवन-मंत्र से हवन सामग्री व घी की आहुतियां दें — संक्षिप्त 11, मध्यम 28, पूर्ण 108।
सामग्री: हवन सामग्री (शाकल्य), शुद्ध घी व स्रुवा (आहुति चम्मच)
28. स्विष्टकृत आहुति
ॐ अग्नये स्विष्टकृते स्वाहा। इदं अग्नये स्विष्टकृते न मम॥
यज्ञ को भली-भांति पूर्ण करने वाले अग्नि को आहुति।
हवन में हुई न्यूनता की पूर्ति हेतु मिठाई/खीर व घी की एक आहुति दें।
सामग्री: शुद्ध घी व स्रुवा (आहुति चम्मच), नैवेद्य (मिठाई/भोग)
29. नवमी हवन — पूर्णाहुति विशेष
देवी को श्रृंगार सहित पूर्णाहुति।
पूर्णाहुति का गोला लाल चुनरी में लपेटकर सौभाग्य-सामग्री सहित अर्पित करें; हवन के बाद कन्या पूजन करें (शीट 12)।
आकाश, अंतरिक्ष, पृथ्वी, जल, औषधियां, वनस्पतियां, सभी देव, ब्रह्म और सम्पूर्ण जगत शांत हो; वह शांति मुझे भी प्राप्त हो। भस्म-धारण: जमदग्नि, कश्यप और देवताओं को जो त्रिगुण आयु मिली है, वह हमें भी मिले।
खड़े होकर शांति पाठ करें; हवन की ठंडी भस्म का मस्तक पर तिलक लगाएं। भस्म ललाट, कंठ, दाहिने कंधे व हृदय पर लगाते हुए त्र्यायुष मंत्र पढ़ें।
सामग्री: भस्म/विभूति
32. आरती (नीराजन)
कदलीगर्भसम्भूतं कर्पूरं तु प्रदीपितम्।
आरार्तिक्यमहं कुर्वे पश्य मे वरदा भव॥
ॐ श्रीदुर्गायै नमः। आरार्तिक्यं समर्पयामि॥
कदली-गर्भ से उत्पन्न, प्रज्वलित कपूर से मैं आरती करता/करती हूँ — मेरी ओर देखें और वर देने वाले हों।
कपूर या घी की आरती थाली को देवता के चरणों पर 4 बार, नाभि पर 2 बार, मुख पर 1 बार और समस्त अंगों पर 7 बार घुमाएं; घंटी बजाते हुए आरती गाएं।
पिछले जन्मों में किए गए जो भी पाप हैं, वे प्रदक्षिणा के प्रत्येक पग के साथ नष्ट हो जाएं।
अपने स्थान पर दाहिनी ओर घूमकर (या प्रतिमा के चारों ओर) प्रदक्षिणा करें — संख्या: 1 (शास्त्र: 'एका चण्ड्या')।
34. क्षमा प्रार्थना
आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम्।
पूजां चैव न जानामि क्षमस्व परमेश्वरि॥
मन्त्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं सुरेश्वरि।
यत्पूजितं मया देवि परिपूर्णं तदस्तु मे॥
अनेन पूजनेन श्रीदुर्गा प्रीयताम्, न मम॥
मैं आवाहन, विसर्जन और पूजा की विधि नहीं जानता/जानती — क्षमा करें। मंत्र, क्रिया और भक्ति में जो कमी रही, उसके बावजूद मेरी पूजा परिपूर्ण हो। इस पूजा से देवता प्रसन्न हों; इसका फल मेरा नहीं, उन्हीं का है।
हाथ जोड़कर पूजा में हुई भूलों हेतु क्षमा मांगें; अंत में जल छोड़ते हुए पूजा का फल देवता को अर्पित करें।
सामग्री: जल पात्र (लोटा) व आचमनी
35. प्रसाद व चरणामृत
प्रसाद आदरपूर्वक स्वयं ग्रहण करें और परिवारजनों में बांटें।
चरणामृत/प्रसाद स्वयं ग्रहण करें और परिवारजनों में वितरित करें।
सभी देवगण मेरी पूजा स्वीकार कर अपने धाम जाएं — मेरी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए और पुनः आगमन के लिए।
अक्षत छोड़ते हुए आवाहित देवताओं को आदरपूर्वक विदा करें। (स्थापित मूर्ति का विसर्जन नहीं होता — केवल आवाहित शक्ति का।)
सामग्री: अक्षत (साबुत चावल)
यह पाठ कार्यपुस्तिका संस्करण से है; परिवार व क्षेत्र की परंपरा के अनुसार विधि भिन्न हो सकती है।
॥ श्री दुर्गा जी की आरती ॥
जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी।
तुमको निशदिन ध्यावत, हरि ब्रह्मा शिवरी॥ जय अम्बे गौरी॥
मांग सिंदूर विराजत, टीको मृगमद को।
उज्ज्वल से दोउ नैना, चंद्रवदन नीको॥ जय अम्बे गौरी॥
कनक समान कलेवर, रक्ताम्बर राजे।
रक्तपुष्प गल माला, कंठन पर साजे॥ जय अम्बे गौरी॥
केहरि वाहन राजत, खड्ग खप्पर धारी।
सुर-नर-मुनिजन सेवत, तिनके दुःखहारी॥ जय अम्बे गौरी॥
कानन कुण्डल शोभित, नासाग्रे मोती।
कोटिक चंद्र दिवाकर, सम राजत ज्योति॥ जय अम्बे गौरी॥
शुम्भ-निशुम्भ बिदारे, महिषासुर घाती।
धूम्र विलोचन नैना, निशिदिन मदमाती॥ जय अम्बे गौरी॥
चंड मुण्ड संहारे, शोणित बीज हरे।
मधु कैटभ दोउ मारे, सुर भय बिन करे॥ जय अम्बे गौरी॥
ब्रह्माणी, रुद्राणी, तुम कमला रानी।
आगम-निगम बखानी, तुम शिव पटरानी॥ जय अम्बे गौरी॥
चौंसठ योगिनी मंगल गावत, नृत्य करत भैरू।
बाजत ताल मृदंगा, अरु बाजत डमरू॥ जय अम्बे गौरी॥
तुम ही जग की माता, तुम ही हो भरता।
भक्तन की दुःख हरता, सुख सम्पत्ति करता॥ जय अम्बे गौरी॥
भुजा चार अति शोभित, खड्ग खप्पर धारी।
मनवांछित फल पावत, सेवत नर नारी॥ जय अम्बे गौरी॥
कंचन थाल विराजत, अगर कपूर की बाती।
श्री मालकेतु में राजत, कोटि रतन ज्योति॥ जय अम्बे गौरी॥
श्री अम्बेजी की आरती, जो कोई नर गावे।
कहत शिवानंद स्वामी, मनवांछित फल पावे॥ जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी॥