पंचांगानुसार गृह प्रवेश मुहूर्त · लगभग 50 मिनट · 36 चरण
उद्देश्य:
नए घर में प्रवेश हेतु वास्तु-दोष निवारण व सुख-समृद्धि की कामना।
अवसर:
पंचांगानुसार गृह प्रवेश मुहूर्त
समय:
पंचांग से निर्धारित शुभ मुहूर्त — पुरोहित से पुष्टि करें
पुरोहित:
हाँ
क्या करें:
प्रवेश से पहले घर की सफाई और गंगाजल छिड़काव; पहली रात घर खाली न छोड़ें (परंपरा)।
पूजन सामग्री: आवश्यक वस्तुओं की सूची
0 / 37 वस्तुएँ तैयार
चरणबद्ध विधि
🔥 अग्नि सुरक्षा: दीपक, कपूर, धूप या हवन की अग्नि जलाते समय सावधानी रखें। बच्चे केवल वयस्कों की देखरेख में भाग लें। जलती अग्नि को कभी अकेला न छोड़ें, पास में पानी रखें और पर्दे, कपड़े व कागज़ दूर रखें। हवन खुले या हवादार स्थान पर करें।
हर श्लोक के बाद 2 सेकंड का विराम · बीच में रोकें, आगे या पीछे जाएँ
1. द्वार व देहली पूजन
ॐ देहल्यै नमः। ॐ द्वारदेवताभ्यो नमः॥
देहली और द्वार के देवताओं को नमस्कार।
मुख्य द्वार पर आम्रपत्र का तोरण बांधें, दोनों ओर रोली से स्वस्तिक बनाएं और देहली (दहलीज) पर रोली-अक्षत-पुष्प अर्पित करें।
व्यक्ति पवित्र हो या अपवित्र, किसी भी अवस्था में हो — जो कमलनयन भगवान का स्मरण करता है, वह भीतर और बाहर से शुद्ध हो जाता है। कमलनयन प्रभु हमें पवित्र करें।
बाएं हाथ में जल लेकर दाएं हाथ की अंगुलियों से अपने ऊपर, आसन पर तथा पूजा-सामग्री पर जल छिड़कें।
सामग्री: जल पात्र (लोटा) व आचमनी, गंगाजल
3. आचमन
ॐ केशवाय नमः। ॐ नारायणाय नमः। ॐ माधवाय नमः॥
ॐ हृषीकेशाय नमः। हस्तं प्रक्षालयामि॥
भगवान केशव, नारायण और माधव को नमस्कार करते हुए आंतरिक शुद्धि हेतु जल ग्रहण करता/करती हूँ; हृषीकेश के नाम से हाथ धोता/धोती हूँ।
दाहिने हाथ की हथेली (गोकर्ण मुद्रा) में थोड़ा जल लेकर एक-एक नाम के साथ तीन बार जल ग्रहण करें, फिर 'हृषीकेशाय नमः' बोलकर हाथ धो लें।
जो शुभ करती है, कल्याण, आरोग्य और धन-सम्पदा देती है तथा शत्रु-बुद्धि का नाश करती है — उस दीप-ज्योति को नमस्कार।
घी का दीपक जलाकर देवता के दाहिनी ओर (आपकी बाईं ओर) रखें; तेल का दीपक हो तो देवता के बाईं ओर। दीपक को प्रणाम करें।
सामग्री: घी का दीपक व रुई की बत्ती, माचिस
6. संकल्प
ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः। श्रीमद्भगवतो महापुरुषस्य विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्य अद्य श्रीब्रह्मणो द्वितीयपरार्धे श्रीश्वेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरे अष्टाविंशतितमे कलियुगे कलिप्रथमचरणे जम्बूद्वीपे भरतखण्डे भारतवर्षे आर्यावर्तैकदेशे (नगर/गांव का नाम) नगरे (संवत्सर का नाम (60 वर्ष चक्र)) नामसंवत्सरे (अयन) (ऋतु (संधि सहित)) (हिंदू मास) मासे (पक्ष) पक्षे (तिथि) तिथौ (वार) वासरे (गोत्र) गोत्रोत्पन्नः/उत्पन्ना (पूजा करने वाले का नाम) नामाहं गृहे सुखशान्तिसमृद्ध्यर्थं वास्तुपूजनपूर्वकं गृहप्रवेशं करिष्ये॥
कोष्ठक ( ) वाले शब्द — पंचांग व गोत्र — संकल्प में आप स्वयं बोलें; ▶ संकल्प सुनें में पंडित जी इन्हें पूछेंगे। नाम व नगर प्रोफ़ाइल से भरे जाते हैं।
मैं (नाम, गोत्र) इस काल, इस स्थान पर, इस उद्देश्य से यह पूजा करने का संकल्प लेता/लेती हूँ।
दाहिने हाथ में जल, अक्षत, पुष्प और दक्षिणा लेकर संकल्प-वाक्य पढ़ें (ऐप आपके नगर, तिथि, नाम व गोत्र से स्वतः भरता है), अंत में जल भूमि या ताम्रपात्र में छोड़ दें।
सामग्री: जल पात्र (लोटा) व आचमनी, अक्षत (साबुत चावल), ताजे पुष्प, दक्षिणा (सिक्का/मुद्रा)
कलश के मुख में विष्णु, कंठ में रुद्र, मूल में ब्रह्मा और मध्य में मातृगण निवास करते हैं — ऐसे सर्वदेवमय कलश का पूजन करता/करती हूँ।
जल भरे कलश (आम्रपल्लव व नारियल सहित) पर रोली, अक्षत व पुष्प अर्पित करें। पूर्ण कलश-स्थापना हेतु शीट 11 देखें।
सामग्री: कलश (तांबा/पीतल/मिट्टी), आम के 5 पत्ते, जटा वाला नारियल, मौली/कलावा, गंगाजल
8. वास्तु पूजन
वास्तोष्पते प्रति जानीह्यस्मान्त्स्वावेशो अनमीवो भवा नः।
यत्त्वेमहे प्रति तन्नो जुषस्व शं नो भव द्विपदे शं चतुष्पदे॥
AI अभ्यास स्वर — वैदिक स्वर शामिल नहीं; उच्चारण की पुष्टि अपने पुरोहित से करें
ॐ वास्तोष्पतये नमः। गन्धाक्षतपुष्पाणि समर्पयामि॥
हे गृह के स्वामी (वास्तोष्पति)! हमें पहचानो, हमारा निवास सुखद और रोग-रहित करो; जो हम मांगें वह स्वीकार करो और मनुष्यों व पशुओं — सबके लिए कल्याणकारी बनो। (ऋग्वेद 7.54.1)
ईशान कोण में वास्तु पुरुष का चित्र/कलश स्थापित कर पंचोपचार पूजन करें और घर में सुख-शांति की प्रार्थना करें।
गज के समान मुख वाले, भूतगणों से सेवित, कैथ व जामुन के फल प्रेम से खाने वाले, उमा के पुत्र, शोक का नाश करने वाले विघ्नेश्वर के चरण-कमलों को मैं नमस्कार करता/करती हूँ।
हाथ जोड़कर नेत्र बंद करें और देवता के स्वरूप का मन में ध्यान करते हुए ध्यान-श्लोक पढ़ें।
शक्कर, मिठाइयां, दही, दूध, घी तथा भक्ष्य-भोज्य आहार रूपी यह नैवेद्य स्वीकार करें। पांचों प्राणों को यह आहुति समर्पित है।
भोग की थाली देवता के सामने रखें, उसके चारों ओर जल से घेरा बनाएं (विष्णु-कृष्ण-राम को तुलसी दल रखकर), फिर पंच-प्राणाहुति मंत्र बोलें।
सामग्री: नैवेद्य (मिठाई/भोग), जल पात्र (लोटा) व आचमनी
18. हवन सुरक्षा जांच
सुरक्षित व शुद्ध वातावरण में ही हवन करें।
हवन से पहले: हवादार स्थान, पास में पानी की बाल्टी/रेत, बच्चों व पालतू पशुओं को दूर रखें, सिंथेटिक वस्त्र न पहनें, मुंह से फूंक न मारें (पंखे का प्रयोग करें), आहुति केवल 'स्वाहा' उच्चारण पर दें।
सामग्री: जल पात्र (लोटा) व आचमनी
19. कुंड/वेदी पूजन
ॐ वेद्यै नमः। गन्धाक्षतपुष्पाणि समर्पयामि॥
यज्ञ-वेदी को नमस्कार कर उसका पूजन करता/करती हूँ।
हवन कुंड को गंगाजल से शुद्ध करें, उसमें रोली से स्वस्तिक बनाएं और चारों ओर कुशा रखें; कुंड पर अक्षत-पुष्प चढ़ाएं।
समिधा से अतिथि-रूप अग्नि की सेवा करो, घी से उन्हें जगाओ और उनमें हवि अर्पित करो। भली-भाँति प्रज्वलित, तेजस्वी जातवेद अग्नि को तीव्र घी अर्पित करो। हे अंगिरा अग्नि, हम समिधा और घी से आपको बढ़ाते हैं; हे सदा युवा, विशाल ज्योति से प्रकाशित हों।
आम की तीन समिधाएँ (लगभग 8 अंगुल लंबी) घी में डुबोकर रखें। हर मंत्र के 'स्वाहा' पर एक समिधा प्रज्वलित अग्नि में रखें।
सामग्री: आम की समिधा (सूखी लकड़ी), शुद्ध घी व स्रुवा (आहुति चम्मच)
हे अदिति, हे अनुमति, हे सरस्वती — इस यज्ञ की अनुमति दें। हे सविता देव, यज्ञ और यजमान को सौभाग्य की ओर प्रेरित करें; बुद्धि को पवित्र करने वाले दिव्य गन्धर्व हमारी बुद्धि पवित्र करें, और वाचस्पति हमारे अन्न को मधुर करें।
आचमनी से जल लेकर कुंड के चारों ओर छिड़कें: पहले मंत्र से दक्षिण में पश्चिम से पूर्व, दूसरे से पश्चिम में दक्षिण से उत्तर, तीसरे से उत्तर में पश्चिम से पूर्व, और चौथे मंत्र से पूर्व से आरंभ कर कुंड के चारों ओर एक परिक्रमा।
सामग्री: जल पात्र (लोटा) व आचमनी
23. अग्नि पूजन
ॐ अग्नये नमः। गन्धाक्षतपुष्पाणि समर्पयामि॥
अग्निदेव को गंध-अक्षत-पुष्प अर्पित करता/करती हूँ।
प्रज्वलित अग्नि को गंध, अक्षत, पुष्प अर्पित कर प्रणाम करें।
सामग्री: चंदन, अक्षत (साबुत चावल), ताजे पुष्प
24. आघार-आज्यभाग आहुति
ॐ प्रजापतये स्वाहा। इदं प्रजापतये न मम॥
ॐ इन्द्राय स्वाहा। इदं इन्द्राय न मम॥
ॐ अग्नये स्वाहा। इदं अग्नये न मम॥
ॐ सोमाय स्वाहा। इदं सोमाय न मम॥
प्रजापति, इन्द्र, अग्नि और सोम को यह आहुति समर्पित है — यह उनकी है, मेरी नहीं।
स्रुवा से घी की चार आहुतियां दें — प्रत्येक 'स्वाहा' पर एक आहुति; 'इदं ... न मम' बोलते हुए स्रुवा का शेष घी अलग पात्र में टपकाएं।
सामग्री: शुद्ध घी व स्रुवा (आहुति चम्मच)
25. व्याहृति आहुति
ॐ भूः स्वाहा। इदं अग्नये न मम॥
ॐ भुवः स्वाहा। इदं वायवे न मम॥
ॐ स्वः स्वाहा। इदं सूर्याय न मम॥
ॐ भूर्भुवः स्वः स्वाहा। इदं प्रजापतये न मम॥
भूलोक के अग्नि, अंतरिक्ष के वायु और स्वर्ग के सूर्य को आहुति — यह उनकी है, मेरी नहीं। चौथी आहुति तीनों लोकों के स्वामी प्रजापति को।
तीन महाव्याहृतियों से और फिर चौथी (समस्त व्याहृति) आहुति प्रजापति को घी से दें।
सामग्री: शुद्ध घी व स्रुवा (आहुति चम्मच)
26. गायत्री आहुति
ॐ भूर्भुवः स्वः। तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि।
धियो यो नः प्रचोदयात् स्वाहा। इदं सवित्रे न मम॥
हम सविता देव के उस वरणीय तेज का ध्यान करते हैं, जो हमारी बुद्धि को प्रेरित करे। यह आहुति सविता की है, मेरी नहीं।
गायत्री मंत्र से घी या शाकल्य की कम से कम 3 आहुतियाँ दें (विस्तृत हवन में 11, 24 या 108)।
सामग्री: शुद्ध घी व स्रुवा (आहुति चम्मच), हवन सामग्री (शाकल्य)
27. मुख्य देवता आहुति
ॐ वास्तोष्पतये स्वाहा। इदं वास्तोष्पतये न मम॥
मुख्य देवता को आहुति — यह उनकी है, मेरी नहीं।
मुख्य देवता के हवन-मंत्र से हवन सामग्री व घी की आहुतियां दें — संक्षिप्त 11, मध्यम 28, पूर्ण 108।
सामग्री: हवन सामग्री (शाकल्य), शुद्ध घी व स्रुवा (आहुति चम्मच)
28. स्विष्टकृत आहुति
ॐ अग्नये स्विष्टकृते स्वाहा। इदं अग्नये स्विष्टकृते न मम॥
यज्ञ को भली-भांति पूर्ण करने वाले अग्नि को आहुति।
हवन में हुई न्यूनता की पूर्ति हेतु मिठाई/खीर व घी की एक आहुति दें।
सामग्री: शुद्ध घी व स्रुवा (आहुति चम्मच), नैवेद्य (मिठाई/भोग)
आकाश, अंतरिक्ष, पृथ्वी, जल, औषधियां, वनस्पतियां, सभी देव, ब्रह्म और सम्पूर्ण जगत शांत हो; वह शांति मुझे भी प्राप्त हो। भस्म-धारण: जमदग्नि, कश्यप और देवताओं को जो त्रिगुण आयु मिली है, वह हमें भी मिले।
खड़े होकर शांति पाठ करें; हवन की ठंडी भस्म का मस्तक पर तिलक लगाएं। भस्म ललाट, कंठ, दाहिने कंधे व हृदय पर लगाते हुए त्र्यायुष मंत्र पढ़ें।
सामग्री: भस्म/विभूति
31. आरती (नीराजन)
कदलीगर्भसम्भूतं कर्पूरं तु प्रदीपितम्।
आरार्तिक्यमहं कुर्वे पश्य मे वरदो भव॥
ॐ श्रीगणेशाय नमः। आरार्तिक्यं समर्पयामि॥
कदली-गर्भ से उत्पन्न, प्रज्वलित कपूर से मैं आरती करता/करती हूँ — मेरी ओर देखें और वर देने वाले हों।
कपूर या घी की आरती थाली को देवता के चरणों पर 4 बार, नाभि पर 2 बार, मुख पर 1 बार और समस्त अंगों पर 7 बार घुमाएं; घंटी बजाते हुए आरती गाएं।
पिछले जन्मों में किए गए जो भी पाप हैं, वे प्रदक्षिणा के प्रत्येक पग के साथ नष्ट हो जाएं।
अपने स्थान पर दाहिनी ओर घूमकर (या प्रतिमा के चारों ओर) प्रदक्षिणा करें — संख्या: 3 (शास्त्र: 'तिस्रः कार्या विनायके')।
33. क्षमा प्रार्थना
आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम्।
पूजां चैव न जानामि क्षमस्व परमेश्वर॥
मन्त्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं सुरेश्वर।
यत्पूजितं मया देव परिपूर्णं तदस्तु मे॥
अनेन पूजनेन श्रीगणेशः प्रीयताम्, न मम॥
मैं आवाहन, विसर्जन और पूजा की विधि नहीं जानता/जानती — क्षमा करें। मंत्र, क्रिया और भक्ति में जो कमी रही, उसके बावजूद मेरी पूजा परिपूर्ण हो। इस पूजा से देवता प्रसन्न हों; इसका फल मेरा नहीं, उन्हीं का है।
हाथ जोड़कर पूजा में हुई भूलों हेतु क्षमा मांगें; अंत में जल छोड़ते हुए पूजा का फल देवता को अर्पित करें।
सामग्री: जल पात्र (लोटा) व आचमनी
34. प्रसाद व चरणामृत
प्रसाद आदरपूर्वक स्वयं ग्रहण करें और परिवारजनों में बांटें।
चरणामृत/प्रसाद स्वयं ग्रहण करें और परिवारजनों में वितरित करें।
सामग्री: नैवेद्य (मिठाई/भोग)
35. दूध उबालना
दूध का उफान घर में सुख-समृद्धि के उफान का प्रतीक है।
रसोई में पूर्व दिशा की ओर मुख करके नए पात्र में दूध उबालें और उफान आने दें — समृद्धि का प्रतीक; उससे खीर बनाकर भोग लगाएं।
सभी देवगण मेरी पूजा स्वीकार कर अपने धाम जाएं — मेरी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए और पुनः आगमन के लिए।
अक्षत छोड़ते हुए आवाहित देवताओं को आदरपूर्वक विदा करें। (स्थापित मूर्ति का विसर्जन नहीं होता — केवल आवाहित शक्ति का।)
सामग्री: अक्षत (साबुत चावल)
यह पाठ कार्यपुस्तिका संस्करण से है; परिवार व क्षेत्र की परंपरा के अनुसार विधि भिन्न हो सकती है।
॥ श्री गणेश जी की आरती ॥
जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती पिता महादेवा॥
एक दंत दयावंत चार भुजा धारी।
माथे सिंदूर सोहे मूसे की सवारी॥ जय गणेश...
पान चढ़े फूल चढ़े और चढ़े मेवा।
लड्डुअन का भोग लगे संत करें सेवा॥ जय गणेश...
अंधन को आंख देत कोढ़िन को काया।
बांझन को पुत्र देत निर्धन को माया॥ जय गणेश...
'सूर' श्याम शरण आए सफल कीजे सेवा।
माता जाकी पार्वती पिता महादेवा॥ जय गणेश...
दीनन की लाज रखो शंभु सुतकारी।
कामना को पूर्ण करो जाऊं बलिहारी॥
जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती पिता महादेवा॥