धन-समृद्धि व व्यापार वृद्धि हेतु लक्ष्मी व कुबेर की संयुक्त पूजा।
अवसर:
दिवाली, शुक्रवार, नई दुकान/व्यापार आरंभ
समय:
सूर्यास्त के बाद प्रदोष काल; उसमें स्थिर (वृषभ) लग्न का समय श्रेष्ठ; अमावस्या व्याप्त हो
पुरोहित:
वैकल्पिक
पूजन सामग्री: आवश्यक वस्तुओं की सूची
0 / 30 वस्तुएँ तैयार
चरणबद्ध विधि
🔥 अग्नि सुरक्षा: दीपक, कपूर, धूप या हवन की अग्नि जलाते समय सावधानी रखें। बच्चे केवल वयस्कों की देखरेख में भाग लें। जलती अग्नि को कभी अकेला न छोड़ें, पास में पानी रखें और पर्दे, कपड़े व कागज़ दूर रखें। हवन खुले या हवादार स्थान पर करें।
हर श्लोक के बाद 2 सेकंड का विराम · बीच में रोकें, आगे या पीछे जाएँ
1. पवित्रीकरण
ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा।
यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः॥
व्यक्ति पवित्र हो या अपवित्र, किसी भी अवस्था में हो — जो कमलनयन भगवान का स्मरण करता है, वह भीतर और बाहर से शुद्ध हो जाता है। कमलनयन प्रभु हमें पवित्र करें।
बाएं हाथ में जल लेकर दाएं हाथ की अंगुलियों से अपने ऊपर, आसन पर तथा पूजा-सामग्री पर जल छिड़कें।
सामग्री: जल पात्र (लोटा) व आचमनी, गंगाजल
2. आचमन
ॐ केशवाय नमः। ॐ नारायणाय नमः। ॐ माधवाय नमः॥
ॐ हृषीकेशाय नमः। हस्तं प्रक्षालयामि॥
भगवान केशव, नारायण और माधव को नमस्कार करते हुए आंतरिक शुद्धि हेतु जल ग्रहण करता/करती हूँ; हृषीकेश के नाम से हाथ धोता/धोती हूँ।
दाहिने हाथ की हथेली (गोकर्ण मुद्रा) में थोड़ा जल लेकर एक-एक नाम के साथ तीन बार जल ग्रहण करें, फिर 'हृषीकेशाय नमः' बोलकर हाथ धो लें।
जो शुभ करती है, कल्याण, आरोग्य और धन-सम्पदा देती है तथा शत्रु-बुद्धि का नाश करती है — उस दीप-ज्योति को नमस्कार।
घी का दीपक जलाकर देवता के दाहिनी ओर (आपकी बाईं ओर) रखें; तेल का दीपक हो तो देवता के बाईं ओर। दीपक को प्रणाम करें।
सामग्री: घी का दीपक व रुई की बत्ती, माचिस
5. संकल्प
ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः। श्रीमद्भगवतो महापुरुषस्य विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्य अद्य श्रीब्रह्मणो द्वितीयपरार्धे श्रीश्वेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरे अष्टाविंशतितमे कलियुगे कलिप्रथमचरणे जम्बूद्वीपे भरतखण्डे भारतवर्षे आर्यावर्तैकदेशे (नगर/गांव का नाम) नगरे (संवत्सर का नाम (60 वर्ष चक्र)) नामसंवत्सरे (अयन) (ऋतु (संधि सहित)) (हिंदू मास) मासे (पक्ष) पक्षे (तिथि) तिथौ (वार) वासरे (गोत्र) गोत्रोत्पन्नः/उत्पन्ना (पूजा करने वाले का नाम) नामाहं धनधान्यसमृद्ध्यर्थं श्रीमहालक्ष्मीकुबेरपूजनं करिष्ये॥
कोष्ठक ( ) वाले शब्द — पंचांग व गोत्र — संकल्प में आप स्वयं बोलें; ▶ संकल्प सुनें में पंडित जी इन्हें पूछेंगे। नाम व नगर प्रोफ़ाइल से भरे जाते हैं।
मैं (नाम, गोत्र) इस काल, इस स्थान पर, इस उद्देश्य से यह पूजा करने का संकल्प लेता/लेती हूँ।
दाहिने हाथ में जल, अक्षत, पुष्प और दक्षिणा लेकर संकल्प-वाक्य पढ़ें (ऐप आपके नगर, तिथि, नाम व गोत्र से स्वतः भरता है), अंत में जल भूमि या ताम्रपात्र में छोड़ दें।
सामग्री: जल पात्र (लोटा) व आचमनी, अक्षत (साबुत चावल), ताजे पुष्प, दक्षिणा (सिक्का/मुद्रा)
6. गणेश स्मरण
वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ।
निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥
ॐ गं गणपतये नमः। गन्धाक्षतपुष्पाणि समर्पयामि॥
हे वक्र सूंड वाले, विशाल शरीर वाले, करोड़ों सूर्यों के समान तेजस्वी देव! मेरे सभी कार्य सदा निर्विघ्न करें।
किसी भी पूजा से पहले विघ्नहर्ता गणेश जी का ध्यान करें और अक्षत-पुष्प अर्पित करें। (गणेश पूजा में यह चरण मुख्य पूजा में समाहित है।)
हे महामाया, श्रीपीठ पर विराजमान, देवताओं से पूजित, हाथों में शंख-चक्र-गदा धारण करने वाली महालक्ष्मी! आपको नमस्कार है।
हाथ जोड़कर नेत्र बंद करें और देवता के स्वरूप का मन में ध्यान करते हुए ध्यान-श्लोक पढ़ें।
9. आवाहन
ॐ हिरण्यवर्णां हरिणीं सुवर्णरजतस्रजाम्।
चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह॥
AI अभ्यास स्वर — वैदिक स्वर शामिल नहीं; उच्चारण की पुष्टि अपने पुरोहित से करें
ॐ श्रीमहालक्ष्म्यै नमः। आवाहयामि स्थापयामि॥
हे अग्निदेव! स्वर्ण-वर्ण वाली, हरिणी-सी चंचल, सोने-चांदी की माला धारण करने वाली, चन्द्रमा-सी शीतल, स्वर्णमयी लक्ष्मी को मेरे लिए बुलाइए। (श्रीसूक्त, प्रथम ऋचा)
आवाहन मुद्रा (दोनों हथेलियां जोड़कर अंगूठे भीतर मोड़ें) से देवता को पूजा-स्थल पर पधारने का निमंत्रण दें; अक्षत छोड़ें।
सबके हित के लिए स्थित, जगत के आधार आपको नमस्कार — यह साष्टांग प्रणाम मैंने प्रयत्नपूर्वक किया है।
साष्टांग (या हाथ जोड़कर सिर झुकाकर) प्रणाम करें।
33. क्षमा प्रार्थना
आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम्।
पूजां चैव न जानामि क्षमस्व परमेश्वरि॥
मन्त्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं सुरेश्वरि।
यत्पूजितं मया देवि परिपूर्णं तदस्तु मे॥
अनेन पूजनेन श्रीमहालक्ष्मीः प्रीयताम्, न मम॥
मैं आवाहन, विसर्जन और पूजा की विधि नहीं जानता/जानती — क्षमा करें। मंत्र, क्रिया और भक्ति में जो कमी रही, उसके बावजूद मेरी पूजा परिपूर्ण हो। इस पूजा से देवता प्रसन्न हों; इसका फल मेरा नहीं, उन्हीं का है।
हाथ जोड़कर पूजा में हुई भूलों हेतु क्षमा मांगें; अंत में जल छोड़ते हुए पूजा का फल देवता को अर्पित करें।
सामग्री: जल पात्र (लोटा) व आचमनी
34. प्रसाद व चरणामृत
प्रसाद आदरपूर्वक स्वयं ग्रहण करें और परिवारजनों में बांटें।
चरणामृत/प्रसाद स्वयं ग्रहण करें और परिवारजनों में वितरित करें।
सभी देवगण मेरी पूजा स्वीकार कर अपने धाम जाएं — मेरी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए और पुनः आगमन के लिए।
अक्षत छोड़ते हुए आवाहित देवताओं को आदरपूर्वक विदा करें। (स्थापित मूर्ति का विसर्जन नहीं होता — केवल आवाहित शक्ति का।)
सामग्री: अक्षत (साबुत चावल)
यह पाठ कार्यपुस्तिका संस्करण से है; परिवार व क्षेत्र की परंपरा के अनुसार विधि भिन्न हो सकती है।
॥ श्री लक्ष्मी जी की आरती ॥
ॐ जय लक्ष्मी माता, मैया जय लक्ष्मी माता।
तुम्हें निशदिन सेवत, हर विष्णु विधाता॥ ॐ जय लक्ष्मी माता॥
उमा रमा ब्रह्माणी, तुम ही जग माता।
सूर्य-चंद्रमा ध्यावत, नारद ऋषि गाता॥ ॐ जय लक्ष्मी माता॥
दुर्गा रूप निरंजनी, सुख सम्पत्ति दाता।
जो कोई तुमको ध्यावत, ऋद्धि-सिद्धि धन पाता॥ ॐ जय लक्ष्मी माता॥
तुम पाताल निवासिनी, तुम ही शुभदाता।
कर्म-प्रभाव-प्रकाशिनी, भवनिधि की त्राता॥ ॐ जय लक्ष्मी माता॥
जिस घर तुम रहती, तहँ सब सद्गुण आता।
सब सम्भव हो जाता, मन नहीं घबराता॥ ॐ जय लक्ष्मी माता॥
तुम बिन यज्ञ न होते, वस्त्र न कोई पाता।
खान-पान का वैभव, सब तुमसे आता॥ ॐ जय लक्ष्मी माता॥
शुभ-गुण मंदिर सुंदर, क्षीरोदधि जाता।
रत्न चतुर्दश तुम बिन, कोई नहीं पाता॥ ॐ जय लक्ष्मी माता॥
महालक्ष्मी जी की आरती, जो कोई नर गावे।
उर आनंद अति उपजे, पाप उतर जावे॥ ॐ जय लक्ष्मी माता॥