पंचांगानुसार / ग्रह-दशा अनुसार · लगभग 52 मिनट · 38 चरण
उद्देश्य:
नौ ग्रहों की शांति व ग्रह-दोष निवारण हेतु।
अवसर:
पंचांगानुसार, ग्रह-दशा अनुसार
समय:
पंचांग से निर्धारित शुभ मुहूर्त — पुरोहित से पुष्टि करें
पुरोहित:
हाँ
पूजन सामग्री: आवश्यक वस्तुओं की सूची
0 / 33 वस्तुएँ तैयार
चरणबद्ध विधि
🔥 अग्नि सुरक्षा: दीपक, कपूर, धूप या हवन की अग्नि जलाते समय सावधानी रखें। बच्चे केवल वयस्कों की देखरेख में भाग लें। जलती अग्नि को कभी अकेला न छोड़ें, पास में पानी रखें और पर्दे, कपड़े व कागज़ दूर रखें। हवन खुले या हवादार स्थान पर करें।
हर श्लोक के बाद 2 सेकंड का विराम · बीच में रोकें, आगे या पीछे जाएँ
1. पवित्रीकरण
ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा।
यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः॥
व्यक्ति पवित्र हो या अपवित्र, किसी भी अवस्था में हो — जो कमलनयन भगवान का स्मरण करता है, वह भीतर और बाहर से शुद्ध हो जाता है। कमलनयन प्रभु हमें पवित्र करें।
बाएं हाथ में जल लेकर दाएं हाथ की अंगुलियों से अपने ऊपर, आसन पर तथा पूजा-सामग्री पर जल छिड़कें।
सामग्री: जल पात्र (लोटा) व आचमनी, गंगाजल
2. आचमन
ॐ केशवाय नमः। ॐ नारायणाय नमः। ॐ माधवाय नमः॥
ॐ हृषीकेशाय नमः। हस्तं प्रक्षालयामि॥
भगवान केशव, नारायण और माधव को नमस्कार करते हुए आंतरिक शुद्धि हेतु जल ग्रहण करता/करती हूँ; हृषीकेश के नाम से हाथ धोता/धोती हूँ।
दाहिने हाथ की हथेली (गोकर्ण मुद्रा) में थोड़ा जल लेकर एक-एक नाम के साथ तीन बार जल ग्रहण करें, फिर 'हृषीकेशाय नमः' बोलकर हाथ धो लें।
जो शुभ करती है, कल्याण, आरोग्य और धन-सम्पदा देती है तथा शत्रु-बुद्धि का नाश करती है — उस दीप-ज्योति को नमस्कार।
घी का दीपक जलाकर देवता के दाहिनी ओर (आपकी बाईं ओर) रखें; तेल का दीपक हो तो देवता के बाईं ओर। दीपक को प्रणाम करें।
सामग्री: घी का दीपक व रुई की बत्ती, माचिस
5. संकल्प
ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः। श्रीमद्भगवतो महापुरुषस्य विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्य अद्य श्रीब्रह्मणो द्वितीयपरार्धे श्रीश्वेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरे अष्टाविंशतितमे कलियुगे कलिप्रथमचरणे जम्बूद्वीपे भरतखण्डे भारतवर्षे आर्यावर्तैकदेशे (नगर/गांव का नाम) नगरे (संवत्सर का नाम (60 वर्ष चक्र)) नामसंवत्सरे (अयन) (ऋतु (संधि सहित)) (हिंदू मास) मासे (पक्ष) पक्षे (तिथि) तिथौ (वार) वासरे (गोत्र) गोत्रोत्पन्नः/उत्पन्ना (पूजा करने वाले का नाम) नामाहं नवग्रहपीडापरिहारार्थं नवग्रहपूजनं करिष्ये॥
कोष्ठक ( ) वाले शब्द — पंचांग व गोत्र — संकल्प में आप स्वयं बोलें; ▶ संकल्प सुनें में पंडित जी इन्हें पूछेंगे। नाम व नगर प्रोफ़ाइल से भरे जाते हैं।
मैं (नाम, गोत्र) इस काल, इस स्थान पर, इस उद्देश्य से यह पूजा करने का संकल्प लेता/लेती हूँ।
दाहिने हाथ में जल, अक्षत, पुष्प और दक्षिणा लेकर संकल्प-वाक्य पढ़ें (ऐप आपके नगर, तिथि, नाम व गोत्र से स्वतः भरता है), अंत में जल भूमि या ताम्रपात्र में छोड़ दें।
सामग्री: जल पात्र (लोटा) व आचमनी, अक्षत (साबुत चावल), ताजे पुष्प, दक्षिणा (सिक्का/मुद्रा)
6. गणेश स्मरण
वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ।
निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥
ॐ गं गणपतये नमः। गन्धाक्षतपुष्पाणि समर्पयामि॥
हे वक्र सूंड वाले, विशाल शरीर वाले, करोड़ों सूर्यों के समान तेजस्वी देव! मेरे सभी कार्य सदा निर्विघ्न करें।
किसी भी पूजा से पहले विघ्नहर्ता गणेश जी का ध्यान करें और अक्षत-पुष्प अर्पित करें। (गणेश पूजा में यह चरण मुख्य पूजा में समाहित है।)
सूर्य से केतु तक नवों ग्रहों का उनके प्रचलित बीज मंत्रों से आवाहन और पूजन।
प्रत्येक ग्रह के खाने में अक्षत-पुष्प अर्पित करते हुए उसका बीज/नाम मंत्र पढ़ें।
सूर्य–गेहूं–लाल | चन्द्र–चावल–सफेद | मंगल–तुअर–लाल | बुध–मूंग–हरा | गुरु–चना–पीला | शुक्र–सफेद राजमा/लोबिया–सफेद | शनि–काले तिल–काला | राहु–उड़द–नीला | केतु–कुलथी–धूम्र
सामग्री: अक्षत (साबुत चावल), ताजे पुष्प
11. आवाहन
ॐ नवग्रहेभ्यो नमः। आवाहयामि स्थापयामि॥
नवग्रह का पूजा-स्थल पर आवाहन और स्थापन करता/करती हूँ।
आवाहन मुद्रा (दोनों हथेलियां जोड़कर अंगूठे भीतर मोड़ें) से देवता को पूजा-स्थल पर पधारने का निमंत्रण दें; अक्षत छोड़ें।
सामग्री: अक्षत (साबुत चावल)
12. गंध (चंदन)
ॐ नवग्रहेभ्यो नमः। गन्धं समर्पयामि॥
सुगंध से भरा, मनोहर, दिव्य श्रीखंड चंदन लेपन हेतु है — हे देवश्रेष्ठ, स्वीकार करें।
अनामिका अंगुली से देवता को चंदन/रोली का तिलक लगाएं।
सामग्री: चंदन, रोली/कुमकुम
13. पुष्प व माला
ॐ नवग्रहेभ्यो नमः। पुष्पाणि पुष्पमालां च समर्पयामि॥
मालती आदि सुगंधित पुष्प और मालाएं मैं लाया/लाई हूँ — हे प्रभु, इन्हें स्वीकार करें।
देवता को ताजे पुष्प और पुष्पमाला अर्पित करें (देवता के प्रिय पुष्प हेतु शीट 13 देखें)।
सामग्री: ताजे पुष्प, पुष्पमाला
14. विशेष पत्र/द्रव्य अर्पण
ॐ नवग्रहेभ्यो नमः। नवधान्यानि वस्त्राणि पुष्पाणि च समर्पयामि॥
नवग्रहों को उनके अनाज, वस्त्र और पुष्प अर्पित करता/करती हूँ।
नवग्रह मंडल के प्रत्येक खाने में ग्रह के रंग का वस्त्र, अनाज और पुष्प अर्पित करें (विवरण: विशेष चरण NG-S2)।
शक्कर, मिठाइयां, दही, दूध, घी तथा भक्ष्य-भोज्य आहार रूपी यह नैवेद्य स्वीकार करें। पांचों प्राणों को यह आहुति समर्पित है।
भोग की थाली देवता के सामने रखें, उसके चारों ओर जल से घेरा बनाएं (विष्णु-कृष्ण-राम को तुलसी दल रखकर), फिर पंच-प्राणाहुति मंत्र बोलें।
सामग्री: नैवेद्य (मिठाई/भोग), जल पात्र (लोटा) व आचमनी
18. हवन सुरक्षा जांच
सुरक्षित व शुद्ध वातावरण में ही हवन करें।
हवन से पहले: हवादार स्थान, पास में पानी की बाल्टी/रेत, बच्चों व पालतू पशुओं को दूर रखें, सिंथेटिक वस्त्र न पहनें, मुंह से फूंक न मारें (पंखे का प्रयोग करें), आहुति केवल 'स्वाहा' उच्चारण पर दें।
सामग्री: जल पात्र (लोटा) व आचमनी
19. कुंड/वेदी पूजन
ॐ वेद्यै नमः। गन्धाक्षतपुष्पाणि समर्पयामि॥
यज्ञ-वेदी को नमस्कार कर उसका पूजन करता/करती हूँ।
हवन कुंड को गंगाजल से शुद्ध करें, उसमें रोली से स्वस्तिक बनाएं और चारों ओर कुशा रखें; कुंड पर अक्षत-पुष्प चढ़ाएं।
समिधा से अतिथि-रूप अग्नि की सेवा करो, घी से उन्हें जगाओ और उनमें हवि अर्पित करो। भली-भाँति प्रज्वलित, तेजस्वी जातवेद अग्नि को तीव्र घी अर्पित करो। हे अंगिरा अग्नि, हम समिधा और घी से आपको बढ़ाते हैं; हे सदा युवा, विशाल ज्योति से प्रकाशित हों।
आम की तीन समिधाएँ (लगभग 8 अंगुल लंबी) घी में डुबोकर रखें। हर मंत्र के 'स्वाहा' पर एक समिधा प्रज्वलित अग्नि में रखें।
सामग्री: आम की समिधा (सूखी लकड़ी), शुद्ध घी व स्रुवा (आहुति चम्मच)
हे अदिति, हे अनुमति, हे सरस्वती — इस यज्ञ की अनुमति दें। हे सविता देव, यज्ञ और यजमान को सौभाग्य की ओर प्रेरित करें; बुद्धि को पवित्र करने वाले दिव्य गन्धर्व हमारी बुद्धि पवित्र करें, और वाचस्पति हमारे अन्न को मधुर करें।
आचमनी से जल लेकर कुंड के चारों ओर छिड़कें: पहले मंत्र से दक्षिण में पश्चिम से पूर्व, दूसरे से पश्चिम में दक्षिण से उत्तर, तीसरे से उत्तर में पश्चिम से पूर्व, और चौथे मंत्र से पूर्व से आरंभ कर कुंड के चारों ओर एक परिक्रमा।
सामग्री: जल पात्र (लोटा) व आचमनी
23. अग्नि पूजन
ॐ अग्नये नमः। गन्धाक्षतपुष्पाणि समर्पयामि॥
अग्निदेव को गंध-अक्षत-पुष्प अर्पित करता/करती हूँ।
प्रज्वलित अग्नि को गंध, अक्षत, पुष्प अर्पित कर प्रणाम करें।
सामग्री: चंदन, अक्षत (साबुत चावल), ताजे पुष्प
24. आघार-आज्यभाग आहुति
ॐ प्रजापतये स्वाहा। इदं प्रजापतये न मम॥
ॐ इन्द्राय स्वाहा। इदं इन्द्राय न मम॥
ॐ अग्नये स्वाहा। इदं अग्नये न मम॥
ॐ सोमाय स्वाहा। इदं सोमाय न मम॥
प्रजापति, इन्द्र, अग्नि और सोम को यह आहुति समर्पित है — यह उनकी है, मेरी नहीं।
स्रुवा से घी की चार आहुतियां दें — प्रत्येक 'स्वाहा' पर एक आहुति; 'इदं ... न मम' बोलते हुए स्रुवा का शेष घी अलग पात्र में टपकाएं।
सामग्री: शुद्ध घी व स्रुवा (आहुति चम्मच)
25. व्याहृति आहुति
ॐ भूः स्वाहा। इदं अग्नये न मम॥
ॐ भुवः स्वाहा। इदं वायवे न मम॥
ॐ स्वः स्वाहा। इदं सूर्याय न मम॥
ॐ भूर्भुवः स्वः स्वाहा। इदं प्रजापतये न मम॥
भूलोक के अग्नि, अंतरिक्ष के वायु और स्वर्ग के सूर्य को आहुति — यह उनकी है, मेरी नहीं। चौथी आहुति तीनों लोकों के स्वामी प्रजापति को।
तीन महाव्याहृतियों से और फिर चौथी (समस्त व्याहृति) आहुति प्रजापति को घी से दें।
सामग्री: शुद्ध घी व स्रुवा (आहुति चम्मच)
26. गायत्री आहुति
ॐ भूर्भुवः स्वः। तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि।
धियो यो नः प्रचोदयात् स्वाहा। इदं सवित्रे न मम॥
हम सविता देव के उस वरणीय तेज का ध्यान करते हैं, जो हमारी बुद्धि को प्रेरित करे। यह आहुति सविता की है, मेरी नहीं।
गायत्री मंत्र से घी या शाकल्य की कम से कम 3 आहुतियाँ दें (विस्तृत हवन में 11, 24 या 108)।
सामग्री: शुद्ध घी व स्रुवा (आहुति चम्मच), हवन सामग्री (शाकल्य)
27. गणेश आहुति
ॐ गं गणपतये स्वाहा। इदं गणपतये न मम॥
गणपति को आहुति — यह उनकी है, मेरी नहीं।
हवन सामग्री व घी से गणेश जी को 21 (संक्षिप्त में 11) आहुतियां दें।
सामग्री: हवन सामग्री (शाकल्य), शुद्ध घी व स्रुवा (आहुति चम्मच)
सूर्य: स्वर्णिम रथ पर सविता देव सब लोकों को देखते हुए आते हैं। चन्द्र: देवता इस यजमान को महान राज्य व श्रेष्ठता हेतु प्रेरित करें; सोम हमारा राजा है। मंगल: अग्नि द्युलोक के शिखर और पृथ्वी के स्वामी हैं, जो जल को जीवन देते हैं। बुध: हे अग्नि, जागें और यजमान के यज्ञ-दान पूर्ण करें। गुरु: हे बृहस्पति, जो तेजस्वी धन जनों में चमकता है, वह हमें दें। शुक्र: प्रजापति ने अन्न का सार ग्रहण किया; यह दूध अमृत और मधु है। शनि: दिव्य जल हमारे कल्याण और पान के लिए सुखद हों। राहु: सदा बढ़ने वाले मित्र किस रक्षा से हमारे सहायक हों। केतु: हे देव, आप अज्ञान को ज्ञान और रूपहीन को रूप देते हुए उषा के साथ प्रकट हुए।
हर ग्रह का वैदिक मंत्र पढ़कर 'स्वाहा' पर उसी ग्रह की समिधा से आहुति दें (क्रम: सूर्य — आक, चन्द्र — पलाश, मंगल — खैर, बुध — अपामार्ग, गुरु — पीपल, शुक्र — गूलर, शनि — शमी, राहु — दूर्वा, केतु — कुशा)।
सामग्री: नवग्रह समिधा (आक, पलाश, खैर, अपामार्ग, पीपल, गूलर, शमी, दूर्वा, कुशा), शुद्ध घी व स्रुवा (आहुति चम्मच)
आकाश, अंतरिक्ष, पृथ्वी, जल, औषधियां, वनस्पतियां, सभी देव, ब्रह्म और सम्पूर्ण जगत शांत हो; वह शांति मुझे भी प्राप्त हो। भस्म-धारण: जमदग्नि, कश्यप और देवताओं को जो त्रिगुण आयु मिली है, वह हमें भी मिले।
खड़े होकर शांति पाठ करें; हवन की ठंडी भस्म का मस्तक पर तिलक लगाएं। भस्म ललाट, कंठ, दाहिने कंधे व हृदय पर लगाते हुए त्र्यायुष मंत्र पढ़ें।
सामग्री: भस्म/विभूति
33. आरती (नीराजन)
ॐ नवग्रहेभ्यो नमः। आरार्तिक्यं समर्पयामि॥
कदली-गर्भ से उत्पन्न, प्रज्वलित कपूर से मैं आरती करता/करती हूँ — मेरी ओर देखें और वर देने वाले हों।
कपूर या घी की आरती थाली को देवता के चरणों पर 4 बार, नाभि पर 2 बार, मुख पर 1 बार और समस्त अंगों पर 7 बार घुमाएं; घंटी बजाते हुए आरती गाएं।
पिछले जन्मों में किए गए जो भी पाप हैं, वे प्रदक्षिणा के प्रत्येक पग के साथ नष्ट हो जाएं।
अपने स्थान पर दाहिनी ओर घूमकर (या प्रतिमा के चारों ओर) प्रदक्षिणा करें — संख्या: यथाशक्ति।
35. क्षमा प्रार्थना
अनेन पूजनेन नवग्रहाः प्रीयन्ताम्, न मम॥
मैं आवाहन, विसर्जन और पूजा की विधि नहीं जानता/जानती — क्षमा करें। मंत्र, क्रिया और भक्ति में जो कमी रही, उसके बावजूद मेरी पूजा परिपूर्ण हो। इस पूजा से देवता प्रसन्न हों; इसका फल मेरा नहीं, उन्हीं का है।
हाथ जोड़कर पूजा में हुई भूलों हेतु क्षमा मांगें; अंत में जल छोड़ते हुए पूजा का फल देवता को अर्पित करें।
सामग्री: जल पात्र (लोटा) व आचमनी
36. प्रसाद व चरणामृत
प्रसाद आदरपूर्वक स्वयं ग्रहण करें और परिवारजनों में बांटें।
चरणामृत/प्रसाद स्वयं ग्रहण करें और परिवारजनों में वितरित करें।
सामग्री: नैवेद्य (मिठाई/भोग)
37. ग्रहानुसार दान
दान से ग्रह-शांति की पूर्णता।
पूजा के बाद ग्रहों के अनाज और वस्त्र जरूरतमंदों/ब्राह्मण को दान करें।
सभी देवगण मेरी पूजा स्वीकार कर अपने धाम जाएं — मेरी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए और पुनः आगमन के लिए।
अक्षत छोड़ते हुए आवाहित देवताओं को आदरपूर्वक विदा करें। (स्थापित मूर्ति का विसर्जन नहीं होता — केवल आवाहित शक्ति का।)
सामग्री: अक्षत (साबुत चावल)
यह पाठ कार्यपुस्तिका संस्करण से है; परिवार व क्षेत्र की परंपरा के अनुसार विधि भिन्न हो सकती है।
अपने आराध्य देव की आरती चुनें
॥ श्री गणेश जी की आरती ॥
जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती पिता महादेवा॥
एक दंत दयावंत चार भुजा धारी।
माथे सिंदूर सोहे मूसे की सवारी॥ जय गणेश...
पान चढ़े फूल चढ़े और चढ़े मेवा।
लड्डुअन का भोग लगे संत करें सेवा॥ जय गणेश...
अंधन को आंख देत कोढ़िन को काया।
बांझन को पुत्र देत निर्धन को माया॥ जय गणेश...
'सूर' श्याम शरण आए सफल कीजे सेवा।
माता जाकी पार्वती पिता महादेवा॥ जय गणेश...
दीनन की लाज रखो शंभु सुतकारी।
कामना को पूर्ण करो जाऊं बलिहारी॥
जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती पिता महादेवा॥
॥ श्री शिव जी की आरती ॥
ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा।
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव, अर्द्धांगी धारा॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥
एकानन चतुरानन पञ्चानन राजे।
हंसासन गरुड़ासन वृषवाहन साजे॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥
दो भुज चार चतुर्भुज दसभुज अति सोहे।
त्रिगुण रूप निरखते त्रिभुवन जन मोहे॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥
अक्षमाला वनमाला मुण्डमाला धारी।
चंदन मृगमद सोहै भाले शशिधारी॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥
श्वेताम्बर पीताम्बर बाघम्बर अंगे।
सनकादिक गरुड़ादिक भूतादिक संगे॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥
कर के मध्य कमण्डलु चक्र त्रिशूलधारी।
सुखकारी दुखहारी जगपालन कारी॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका।
प्रणवाक्षर में शोभित ये तीनों एका॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥
लक्ष्मी व सावित्री पार्वती संगा।
पार्वती अर्द्धांगी, शिवलहरी गंगा॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥
पर्वत सोहैं पार्वती, शंकर कैलासा।
भांग धतूर का भोजन, भस्मी में वासा॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥
जटा में गंग बहत है, गल मुण्डन माला।
शेष नाग लिपटावत, ओढ़त मृगछाला॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥
काशी में विराजे विश्वनाथ, नन्दी ब्रह्मचारी।
नित उठ दर्शन पावत, महिमा अति भारी॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥
त्रिगुणस्वामी जी की आरति जो कोइ नर गावे।
कहत शिवानन्द स्वामी, मनवांछित फल पावे॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥
॥ श्री विष्णु जी की आरती ॥
ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे।
भक्त जनों के संकट, क्षण में दूर करे॥ ॐ जय जगदीश हरे॥
जो ध्यावे फल पावे, दुःख बिनसे मन का।
स्वामी दुःख बिनसे मन का, सुख सम्पत्ति घर आवे, कष्ट मिटे तन का॥ ॐ जय जगदीश हरे॥
मात-पिता तुम मेरे, शरण गहूं मैं किसकी।
स्वामी शरण गहूं मैं किसकी, तुम बिनु और न दूजा, आस करूं जिसकी॥ ॐ जय जगदीश हरे॥
तुम पूरन परमात्मा, तुम अंतर्यामी।
स्वामी तुम अंतर्यामी, पारब्रह्म परमेश्वर, तुम सबके स्वामी॥ ॐ जय जगदीश हरे॥
तुम करुणा के सागर, तुम पालनकर्ता।
स्वामी तुम पालनकर्ता, मैं सेवक तुम स्वामी, कृपा करो भर्ता॥ ॐ जय जगदीश हरे॥
तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति।
स्वामी सबके प्राणपति, किस विधि मिलूं दयामय, तुमको मैं कुमति॥ ॐ जय जगदीश हरे॥
दीनबंधु दुखहर्ता, तुम ठाकुर मेरे।
स्वामी तुम ठाकुर मेरे, अपने हाथ उठाओ, द्वार पड़ा तेरे॥ ॐ जय जगदीश हरे॥
विषय विकार मिटाओ, पाप हरो देवा।
स्वामी पाप हरो देवा, श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ, सन्तन की सेवा॥ ॐ जय जगदीश हरे॥
श्री जगदीश हरे प्रभु जय जगदीश हरे।
भक्त जनों के संकट क्षण में दूर करे॥ ॐ जय जगदीश हरे॥
॥ श्री सत्यनारायण जी की आरती ॥
ॐ जय लक्ष्मी रमणा, स्वामी जय लक्ष्मी रमणा।
सत्यनारायण स्वामी, जनपातक हरणा॥ ॐ जय लक्ष्मी रमणा॥
रत्नजड़ित सिंहासन, अद्भुत छवि राजे।
नारद करत निराजन, घण्टा ध्वनि बाजे॥ ॐ जय लक्ष्मी रमणा॥
प्रकट भये कलि कारण, द्विज को दर्श दियो।
बूढ़ा ब्राह्मण बनकर, कंचन महल कियो॥ ॐ जय लक्ष्मी रमणा॥
दुर्बल भील कठारो, जिन पर कृपा करी।
चन्द्रचूड़ एक राजा, तिनकी बिपति हरी॥ ॐ जय लक्ष्मी रमणा॥
वैश्य मनोरथ पायो, श्रद्धा तज दीन्हीं।
सो फल भोग्यो प्रभुजी, फिर स्तुति कीन्हीं॥ ॐ जय लक्ष्मी रमणा॥
भाव-भक्ति के कारण, छिन-छिन रूप धर्यो।
श्रद्धा धारण कीन्हीं, तिनको काज सर्यो॥ ॐ जय लक्ष्मी रमणा॥
ग्वाल-बाल संग राजा, बन में भक्ति करी।
मनवांछित फल दीन्हों, दीनदयाल हरि॥ ॐ जय लक्ष्मी रमणा॥
चढ़त प्रसाद सवाया, कदली फल मेवा।
धूप-दीप-तुलसी से, राजी सत्यदेवा॥ ॐ जय लक्ष्मी रमणा॥
श्री सत्यनारायण जी की आरती, जो कोई नर गावे।
कहत शिवानन्द स्वामी, मनवांछित फल पावे॥ ॐ जय लक्ष्मी रमणा॥
॥ श्री लक्ष्मी जी की आरती ॥
ॐ जय लक्ष्मी माता, मैया जय लक्ष्मी माता।
तुम्हें निशदिन सेवत, हर विष्णु विधाता॥ ॐ जय लक्ष्मी माता॥
उमा रमा ब्रह्माणी, तुम ही जग माता।
सूर्य-चंद्रमा ध्यावत, नारद ऋषि गाता॥ ॐ जय लक्ष्मी माता॥
दुर्गा रूप निरंजनी, सुख सम्पत्ति दाता।
जो कोई तुमको ध्यावत, ऋद्धि-सिद्धि धन पाता॥ ॐ जय लक्ष्मी माता॥
तुम पाताल निवासिनी, तुम ही शुभदाता।
कर्म-प्रभाव-प्रकाशिनी, भवनिधि की त्राता॥ ॐ जय लक्ष्मी माता॥
जिस घर तुम रहती, तहँ सब सद्गुण आता।
सब सम्भव हो जाता, मन नहीं घबराता॥ ॐ जय लक्ष्मी माता॥
तुम बिन यज्ञ न होते, वस्त्र न कोई पाता।
खान-पान का वैभव, सब तुमसे आता॥ ॐ जय लक्ष्मी माता॥
शुभ-गुण मंदिर सुंदर, क्षीरोदधि जाता।
रत्न चतुर्दश तुम बिन, कोई नहीं पाता॥ ॐ जय लक्ष्मी माता॥
महालक्ष्मी जी की आरती, जो कोई नर गावे।
उर आनंद अति उपजे, पाप उतर जावे॥ ॐ जय लक्ष्मी माता॥
॥ श्री दुर्गा जी की आरती ॥
जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी।
तुमको निशदिन ध्यावत, हरि ब्रह्मा शिवरी॥ जय अम्बे गौरी॥
मांग सिंदूर विराजत, टीको मृगमद को।
उज्ज्वल से दोउ नैना, चंद्रवदन नीको॥ जय अम्बे गौरी॥
कनक समान कलेवर, रक्ताम्बर राजे।
रक्तपुष्प गल माला, कंठन पर साजे॥ जय अम्बे गौरी॥
केहरि वाहन राजत, खड्ग खप्पर धारी।
सुर-नर-मुनिजन सेवत, तिनके दुःखहारी॥ जय अम्बे गौरी॥
कानन कुण्डल शोभित, नासाग्रे मोती।
कोटिक चंद्र दिवाकर, सम राजत ज्योति॥ जय अम्बे गौरी॥
शुम्भ-निशुम्भ बिदारे, महिषासुर घाती।
धूम्र विलोचन नैना, निशिदिन मदमाती॥ जय अम्बे गौरी॥
चंड मुण्ड संहारे, शोणित बीज हरे।
मधु कैटभ दोउ मारे, सुर भय बिन करे॥ जय अम्बे गौरी॥
ब्रह्माणी, रुद्राणी, तुम कमला रानी।
आगम-निगम बखानी, तुम शिव पटरानी॥ जय अम्बे गौरी॥
चौंसठ योगिनी मंगल गावत, नृत्य करत भैरू।
बाजत ताल मृदंगा, अरु बाजत डमरू॥ जय अम्बे गौरी॥
तुम ही जग की माता, तुम ही हो भरता।
भक्तन की दुःख हरता, सुख सम्पत्ति करता॥ जय अम्बे गौरी॥
भुजा चार अति शोभित, खड्ग खप्पर धारी।
मनवांछित फल पावत, सेवत नर नारी॥ जय अम्बे गौरी॥
कंचन थाल विराजत, अगर कपूर की बाती।
श्री मालकेतु में राजत, कोटि रतन ज्योति॥ जय अम्बे गौरी॥
श्री अम्बेजी की आरती, जो कोई नर गावे।
कहत शिवानंद स्वामी, मनवांछित फल पावे॥ जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी॥
॥ श्री हनुमान जी की आरती ॥
आरती कीजै हनुमान लला की। दुष्ट दलन रघुनाथ कला की॥
जाके बल से गिरिवर कांपे। रोग दोष जाके निकट न झांके॥
अंजनि पुत्र महा बलदाई। संतन के प्रभु सदा सहाई॥ आरती कीजै...
दे बीरा रघुनाथ पठाए। लंका जारि सिया सुधि लाए॥
लंका सो कोट समुद्र सी खाई। जात पवनसुत बार न लाई॥ आरती कीजै...
लंका जारि असुर संहारे। सियारामजी के काज संवारे॥
लक्ष्मण मूर्छित पड़े सकारे। आनि संजीवन प्राण उबारे॥ आरती कीजै...
पैठि पताल तोरि जमकारे। अहिरावण की भुजा उखारे॥
बाईं भुजा असुर दल मारे। दाहिने भुजा संतजन तारे॥ आरती कीजै...
सुर नर मुनि जन आरती उतारें। जय जय जय हनुमान उचारें॥
कंचन थार कपूर लौ छाई। आरती करत अंजना माई॥ आरती कीजै...
जो हनुमानजी की आरती गावै। बसि बैकुण्ठ परम पद पावै॥
लंक विध्वंस किए रघुराई। तुलसीदास स्वामी कीर्ति गाई॥
आरती कीजै हनुमान लला की। दुष्ट दलन रघुनाथ कला की॥
॥ श्री कृष्ण जी की आरती ॥
आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥
गले में बैजंती माला, बजावै मुरली मधुर बाला।
श्रवण में कुण्डल झलकाला, नंद के आनंद नंदलाला।
गगन सम अंग कांति काली, राधिका चमक रही आली।
लतन में ठाढ़े बनमाली,
भ्रमर सी अलक, कस्तूरी तिलक, चंद्र सी झलक,
ललित छवि श्यामा प्यारी की॥ श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥
आरती कुंजबिहारी की...
कनकमय मोर मुकुट बिलसै, देवता दरसन को तरसैं।
गगन सों सुमन रासि बरसै,
बजे मुरचंग, मधुर मिरदंग, ग्वालिन संग,
अतुल रति गोप कुमारी की॥ श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥
आरती कुंजबिहारी की...
जहां ते प्रकट भई गंगा, सकल मन हारिणि श्री गंगा।
स्मरन ते होत मोह भंगा,
बसी शिव सीस, जटा के बीच, हरै अघ कीच,
चरन छवि श्रीबनवारी की॥ श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥
आरती कुंजबिहारी की...
चमकती उज्ज्वल तट रेनू, बज रही वृंदावन बेनू।
चहुं दिसि गोपि ग्वाल धेनू,
हंसत मृदु मंद, चांदनी चंद, कटत भव फंद,
टेर सुन दीन दुखारी की॥ श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥
आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥
॥ श्री राम स्तुति ॥
श्रीरामचन्द्र कृपालु भजु मन हरण भवभय दारुणं।
नवकञ्ज लोचन कञ्ज मुख कर कञ्ज पद कञ्जारुणं॥
कन्दर्प अगणित अमित छवि नवनील नीरद सुन्दरं।
पटपीत मानहुँ तडित रुचि शुचि नौमि जनक सुतावरं॥
भजु दीनबन्धु दिनेश दानव दैत्य वंश निकन्दनं।
रघुनन्द आनन्द कन्द कोशल चन्द्र दशरथ नन्दनं॥
सिर मुकुट कुण्डल तिलक चारु उदारु अङ्ग विभूषणं।
आजानु भुज शर चाप धर सङ्ग्राम जित खरदूषणं॥
इति वदति तुलसीदास शङ्कर शेष मुनि मन रञ्जनं।
मम हृदय कञ्ज निवास कुरु कामादि खल दल गञ्जनं॥
॥ श्री सरस्वती जी की आरती ॥
जय सरस्वती माता, मैया जय सरस्वती माता।
सदगुण वैभव शालिनी, त्रिभुवन विख्याता॥ जय सरस्वती माता॥
चन्द्रवदनि पद्मासिनि, द्युति मंगलकारी।
सोहे शुभ हंस सवारी, अतुल तेजधारी॥ जय सरस्वती माता॥
बाएं कर में वीणा, दाएं कर माला।
शीश मुकुट मणि सोहे, गल मोतियन माला॥ जय सरस्वती माता॥
देवी शरण जो आए, उनका उद्धार किया।
पैठी मंथरा दासी, रावण संहार किया॥ जय सरस्वती माता॥
विद्या ज्ञान प्रदायिनि, ज्ञान प्रकाश भरो।
मोह अज्ञान और तिमिर का, जग से नाश करो॥ जय सरस्वती माता॥
धूप दीप फल मेवा, माँ स्वीकार करो।
ज्ञानचक्षु दे माता, जग निस्तार करो॥ जय सरस्वती माता॥
माँ सरस्वती की आरती, जो कोई जन गावे।
हितकारी सुखकारी, ज्ञान भक्ति पावे॥ जय सरस्वती माता॥