पूर्णिमा / एकादशी / शुभ अवसर · लगभग 57 मिनट · 47 चरण
उद्देश्य:
सत्य व भगवान नारायण की कृपा हेतु कथा-श्रवण; मनोकामना पूर्ति पर विशेष।
अवसर:
पूर्णिमा, एकादशी, शुभ अवसर (गृह प्रवेश/विवाह पश्चात)
समय:
सूर्यास्त के बाद का प्रदोष काल
व्रत:
पूजा तक उपवास (वैकल्पिक)
पुरोहित:
वैकल्पिक
पूजन सामग्री: आवश्यक वस्तुओं की सूची
0 / 34 वस्तुएँ तैयार
चरणबद्ध विधि
🔥 अग्नि सुरक्षा: दीपक, कपूर, धूप या हवन की अग्नि जलाते समय सावधानी रखें। बच्चे केवल वयस्कों की देखरेख में भाग लें। जलती अग्नि को कभी अकेला न छोड़ें, पास में पानी रखें और पर्दे, कपड़े व कागज़ दूर रखें। हवन खुले या हवादार स्थान पर करें।
हर श्लोक के बाद 2 सेकंड का विराम · बीच में रोकें, आगे या पीछे जाएँ
1. मंडप सज्जा
केले के मंडप में भगवान की स्थापना सत्यनारायण पूजा की परंपरा है।
चौकी के चारों कोनों पर केले के खंभे/पत्ते बांधकर मंडप बनाएं; बीच में भगवान सत्यनारायण का चित्र/शालिग्राम स्थापित करें।
सामग्री: केले के पत्ते/खंभे, चौकी व लाल/पीला वस्त्र, देव प्रतिमा/चित्र
2. पवित्रीकरण
ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा।
यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः॥
व्यक्ति पवित्र हो या अपवित्र, किसी भी अवस्था में हो — जो कमलनयन भगवान का स्मरण करता है, वह भीतर और बाहर से शुद्ध हो जाता है। कमलनयन प्रभु हमें पवित्र करें।
बाएं हाथ में जल लेकर दाएं हाथ की अंगुलियों से अपने ऊपर, आसन पर तथा पूजा-सामग्री पर जल छिड़कें।
सामग्री: जल पात्र (लोटा) व आचमनी, गंगाजल
3. आचमन
ॐ केशवाय नमः। ॐ नारायणाय नमः। ॐ माधवाय नमः॥
ॐ हृषीकेशाय नमः। हस्तं प्रक्षालयामि॥
भगवान केशव, नारायण और माधव को नमस्कार करते हुए आंतरिक शुद्धि हेतु जल ग्रहण करता/करती हूँ; हृषीकेश के नाम से हाथ धोता/धोती हूँ।
दाहिने हाथ की हथेली (गोकर्ण मुद्रा) में थोड़ा जल लेकर एक-एक नाम के साथ तीन बार जल ग्रहण करें, फिर 'हृषीकेशाय नमः' बोलकर हाथ धो लें।
AI अभ्यास स्वर — वैदिक स्वर शामिल नहीं; उच्चारण की पुष्टि अपने पुरोहित से करें
यशस्वी इन्द्र, सर्वज्ञ पूषा, अरिष्टनेमि गरुड़ और बृहस्पति — ये सब हमारा कल्याण करें। तीनों प्रकार की शांति हो।
हाथ जोड़कर मंगल-पाठ करें।
7. संकल्प
ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः। श्रीमद्भगवतो महापुरुषस्य विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्य अद्य श्रीब्रह्मणो द्वितीयपरार्धे श्रीश्वेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरे अष्टाविंशतितमे कलियुगे कलिप्रथमचरणे जम्बूद्वीपे भरतखण्डे भारतवर्षे आर्यावर्तैकदेशे (नगर/गांव का नाम) नगरे (संवत्सर का नाम (60 वर्ष चक्र)) नामसंवत्सरे (अयन) (ऋतु (संधि सहित)) (हिंदू मास) मासे (पक्ष) पक्षे (तिथि) तिथौ (वार) वासरे (गोत्र) गोत्रोत्पन्नः/उत्पन्ना (पूजा करने वाले का नाम) नामाहं श्रीसत्यनारायणप्रीत्यर्थं सत्यनारायणव्रतकथापूजनं करिष्ये॥
कोष्ठक ( ) वाले शब्द — पंचांग व गोत्र — संकल्प में आप स्वयं बोलें; ▶ संकल्प सुनें में पंडित जी इन्हें पूछेंगे। नाम व नगर प्रोफ़ाइल से भरे जाते हैं।
मैं (नाम, गोत्र) इस काल, इस स्थान पर, इस उद्देश्य से यह पूजा करने का संकल्प लेता/लेती हूँ।
दाहिने हाथ में जल, अक्षत, पुष्प और दक्षिणा लेकर संकल्प-वाक्य पढ़ें (ऐप आपके नगर, तिथि, नाम व गोत्र से स्वतः भरता है), अंत में जल भूमि या ताम्रपात्र में छोड़ दें।
सामग्री: जल पात्र (लोटा) व आचमनी, अक्षत (साबुत चावल), ताजे पुष्प, दक्षिणा (सिक्का/मुद्रा)
8. गणेश स्मरण
वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ।
निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥
ॐ गं गणपतये नमः। गन्धाक्षतपुष्पाणि समर्पयामि॥
हे वक्र सूंड वाले, विशाल शरीर वाले, करोड़ों सूर्यों के समान तेजस्वी देव! मेरे सभी कार्य सदा निर्विघ्न करें।
किसी भी पूजा से पहले विघ्नहर्ता गणेश जी का ध्यान करें और अक्षत-पुष्प अर्पित करें। (गणेश पूजा में यह चरण मुख्य पूजा में समाहित है।)
शांत आकृति वाले, शेषनाग पर शयन करने वाले, नाभि में कमल वाले, देवताओं के ईश्वर, विश्व के आधार, आकाश के समान व्यापक, मेघ के वर्ण वाले, सुंदर अंगों वाले, लक्ष्मीपति, कमलनयन, योगियों द्वारा ध्यान से प्राप्य, संसार-भय हरने वाले, सब लोकों के एकमात्र स्वामी विष्णु की वंदना करता/करती हूँ।
हाथ जोड़कर नेत्र बंद करें और देवता के स्वरूप का मन में ध्यान करते हुए ध्यान-श्लोक पढ़ें।
अग्नि का स्वर्ण-बीज, हिरण्यगर्भ से उत्पन्न, अनंत पुण्य देने वाली यह दक्षिणा अर्पित है — मुझे शांति दें।
सिक्का/मुद्रा देवता के सामने दक्षिणा रूप में रखें।
सामग्री: दक्षिणा (सिक्का/मुद्रा)
39. मंत्र जप
ॐ सत्यनारायणाय नमः
सत्य-स्वरूप भगवान नारायण को नमस्कार।
जप-माला से देवता के मूल मंत्र का जप करें — संक्षिप्त मोड 11, मध्यम 21, पूर्ण 108 बार।
सामग्री: जप माला (108 मनके)
40. कथा / पाठ
कथा-श्रवण या स्तोत्र-पाठ से पूजा का फल पूर्ण होता है।
कथा पढ़ें/सुनें: श्री सत्यनारायण व्रत कथा (स्कन्द पुराण, रेवा खण्ड) — कथा-सार शीट 19 में। (इस व्रत में कथा अनिवार्य है)
सामग्री: पूजनीय ग्रंथ/पुस्तक
श्री सत्यनारायण व्रत कथा (स्कन्द पुराण, रेवा खण्ड)
अध्याय 1: मृत्युलोक के दुःखी जीवों को देखकर नारद जी भगवान विष्णु से उपाय पूछते हैं; भगवान सत्यनारायण व्रत की विधि और महिमा बताते हैं।
अध्याय 2: काशी के निर्धन ब्राह्मण को भगवान वृद्ध ब्राह्मण के वेश में व्रत बताते हैं; व्रत से उसकी दरिद्रता दूर होती है। उसे देखकर एक लकड़हारा भी व्रत कर समृद्ध होता है।
अध्याय 3: राजा उल्कामुख का व्रत देखकर साधु नामक वैश्य संतान हेतु मन्नत मानता है, पर पुत्री कलावती के जन्म और विवाह पर भी व्रत टालता रहता है; वचन-भंग के कारण वह दामाद सहित चोरी के झूठे आरोप में बंदी होता है।
अध्याय 4: पत्नी लीलावती और पुत्री कलावती के व्रत से साधु मुक्त होता है। लौटते समय दंडी-वेशधारी भगवान से झूठ बोलने पर उसका धन लता-पत्र बन जाता है और क्षमा मांगने पर लौटता है। कलावती प्रसाद छोड़कर दौड़ती है तो नाव डूब जाती है; प्रसाद ग्रहण करने पर सब ठीक होता है।
अध्याय 5: राजा तुंगध्वज वन में ग्वालों की सत्यनारायण पूजा का प्रसाद अहंकारवश ठुकराकर संकट में पड़ता है; पश्चाताप कर प्रसाद ग्रहण करने पर सुख पाता है। शिक्षा — सत्य-वचन का पालन और प्रसाद का आदर।
41. आरती (नीराजन)
कदलीगर्भसम्भूतं कर्पूरं तु प्रदीपितम्।
आरार्तिक्यमहं कुर्वे पश्य मे वरदो भव॥
ॐ श्रीसत्यनारायणाय नमः। आरार्तिक्यं समर्पयामि॥
कदली-गर्भ से उत्पन्न, प्रज्वलित कपूर से मैं आरती करता/करती हूँ — मेरी ओर देखें और वर देने वाले हों।
कपूर या घी की आरती थाली को देवता के चरणों पर 4 बार, नाभि पर 2 बार, मुख पर 1 बार और समस्त अंगों पर 7 बार घुमाएं; घंटी बजाते हुए आरती गाएं।
सबके हित के लिए स्थित, जगत के आधार आपको नमस्कार — यह साष्टांग प्रणाम मैंने प्रयत्नपूर्वक किया है।
साष्टांग (या हाथ जोड़कर सिर झुकाकर) प्रणाम करें।
45. क्षमा प्रार्थना
आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम्।
पूजां चैव न जानामि क्षमस्व परमेश्वर॥
मन्त्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं सुरेश्वर।
यत्पूजितं मया देव परिपूर्णं तदस्तु मे॥
अनेन पूजनेन श्रीसत्यनारायणः प्रीयताम्, न मम॥
मैं आवाहन, विसर्जन और पूजा की विधि नहीं जानता/जानती — क्षमा करें। मंत्र, क्रिया और भक्ति में जो कमी रही, उसके बावजूद मेरी पूजा परिपूर्ण हो। इस पूजा से देवता प्रसन्न हों; इसका फल मेरा नहीं, उन्हीं का है।
हाथ जोड़कर पूजा में हुई भूलों हेतु क्षमा मांगें; अंत में जल छोड़ते हुए पूजा का फल देवता को अर्पित करें।
सामग्री: जल पात्र (लोटा) व आचमनी
46. प्रसाद व चरणामृत
अकालमृत्युहरणं सर्वव्याधिविनाशनम्।
विष्णुपादोदकं पीत्वा पुनर्जन्म न विद्यते॥
अकाल मृत्यु हरने वाले और सब रोगों का नाश करने वाले भगवान विष्णु के चरणोदक का पान करने से पुनर्जन्म नहीं होता।
चरणामृत/प्रसाद स्वयं ग्रहण करें और परिवारजनों में वितरित करें।
सभी देवगण मेरी पूजा स्वीकार कर अपने धाम जाएं — मेरी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए और पुनः आगमन के लिए।
अक्षत छोड़ते हुए आवाहित देवताओं को आदरपूर्वक विदा करें। (स्थापित मूर्ति का विसर्जन नहीं होता — केवल आवाहित शक्ति का।)
सामग्री: अक्षत (साबुत चावल)
यह पाठ कार्यपुस्तिका संस्करण से है; परिवार व क्षेत्र की परंपरा के अनुसार विधि भिन्न हो सकती है।
॥ श्री विष्णु जी की आरती ॥
ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे।
भक्त जनों के संकट, क्षण में दूर करे॥ ॐ जय जगदीश हरे॥
जो ध्यावे फल पावे, दुःख बिनसे मन का।
स्वामी दुःख बिनसे मन का, सुख सम्पत्ति घर आवे, कष्ट मिटे तन का॥ ॐ जय जगदीश हरे॥
मात-पिता तुम मेरे, शरण गहूं मैं किसकी।
स्वामी शरण गहूं मैं किसकी, तुम बिनु और न दूजा, आस करूं जिसकी॥ ॐ जय जगदीश हरे॥
तुम पूरन परमात्मा, तुम अंतर्यामी।
स्वामी तुम अंतर्यामी, पारब्रह्म परमेश्वर, तुम सबके स्वामी॥ ॐ जय जगदीश हरे॥
तुम करुणा के सागर, तुम पालनकर्ता।
स्वामी तुम पालनकर्ता, मैं सेवक तुम स्वामी, कृपा करो भर्ता॥ ॐ जय जगदीश हरे॥
तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति।
स्वामी सबके प्राणपति, किस विधि मिलूं दयामय, तुमको मैं कुमति॥ ॐ जय जगदीश हरे॥
दीनबंधु दुखहर्ता, तुम ठाकुर मेरे।
स्वामी तुम ठाकुर मेरे, अपने हाथ उठाओ, द्वार पड़ा तेरे॥ ॐ जय जगदीश हरे॥
विषय विकार मिटाओ, पाप हरो देवा।
स्वामी पाप हरो देवा, श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ, सन्तन की सेवा॥ ॐ जय जगदीश हरे॥
श्री जगदीश हरे प्रभु जय जगदीश हरे।
भक्त जनों के संकट क्षण में दूर करे॥ ॐ जय जगदीश हरे॥